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आत्मा के परमात्मा से मिलन का भक्ति पर्व ‘महारास’

अमल श्रीवास्तव 
बिलासपुर(छत्तीसगढ़)

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शरद पूर्णिमा विशेष…

भगवान कृष्ण के महारास को समझने के लिए विवेक पूर्ण विवेचन की अत्यंत आवश्यकता है। ‘रास’ शब्द संस्कृत के ‘रस’ से उत्तपन्न हुआ है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-निचोड़,तत्व-अर्क,आनन्द।

काव्य में जो आनन्द आता है,वह ही काव्य का रस है। काव्य में आने वाला आनन्द अर्थात् रस सामान्यतः लौकिक ही होता है,रस काव्य की आत्मा है। रस के लौकिक आनंद के कारण इन्द्रियाँ अपना कार्य करती हैं,और आनंदित होती हैं।
भक्ति का रस अलौकिक होता है,रस का अलौकिक रूप आनंद रूप है और यही आनंद विशाल का- विराट का अनुभव भी है।
आदमी इन्द्रियों पर संयम करता है तो विषयों से अपने-आप हट जाता है। रस के रूप में जिसकी निष्पत्ति होती है,वह भाव ही है। जब रस बन जाता है,तो भाव नहीं रहता,केवल रस रहता है।
किसी भी फ़ल या सब्जी का निचोड़ रस होता है। भक्त की भक्ति का निचोड़ रस ही रास-आनन्द होता है।
भगवान कृष्ण १६ कलाओं के अवतार थे,समस्त गोपियाँ पुराने जन्मों के ऋषि-मुनि ही थे,जो कृष्ण को तत्व से जानना चाहते थे और कलाओं की खूबी में डूब जाना चाहते थे। भगवान कृष्ण ने उनकी मनोकामना पूर्ति के लिए शरद पूर्णिमा का दिन चुना क्योंकि इस दिन रसाधिपति चन्द्र देव भी १६ कलाओं में होते हैं,उसी की चाँदनी में पूर्ण १६ कलाओं का प्रकटीकरण करना था। चन्द्रोदय के साथ ही उन्होंने ‘क्लीं’ बीज मंत्र का संपुट लगाकर बाँसुरी से ध्वनियों का राग छेड़ा। बीज मंत्र द्वारा उन्होंने असुरों व आसुरी शक्ति से वृन्दावन को सुरक्षा चक्र के घेरे में कर दिया। सभी गोपिकाओं के हृदय और देवताओं तक अपना संदेश पहुंचा दिया। जो कृष्ण भक्त नहीं थे,वे सब गहरी नींद में सो गए,पर भगवान ब्रह्मा व शिव सहित सभी देवी- देवता,ऋषि-मुनि गोपिकाओं के रूप में ‘महारास’ अर्थात ‘परमानन्द’ में डूबने हेतु ‘सत-चित-आनन्द’ श्रीकृष्ण के समक्ष उपस्थित हुए।
शास्त्रों में आत्मा को स्त्री व परमात्मा को पुरुष कहा गया है। श्रीकृष्ण पुरुष थे व समस्त देव, किन्नर व ऋषियों-मुनियों की आत्माएं स्त्री स्वरूप में गोपिकाएँ थी। उस दिन सबने श्रीकृष्ण को तत्व से जाना। उनकी १६ कलाओं में अवतार का रहस्य जाना,उनकी भक्ति-गीत-नृत्य में खो गए। श्रीकृष्ण के चरणों मे खोकर सब विदेहराज-जनक जैसे हो गए। किसी को स्वयं का भान न रहा,सबमें सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण थे। आत्मा का परमात्मा से मिलन का यह भक्ति पर्व महारास कहलाया। तब श्रीकृष्ण ने सभी को वरदान दिया कि जो भक्त शरद पूर्णिमा के दिन स्वयं को भूलकर मेरी भक्ति के रस में डूबकर चन्द्र को अपलक निहारेगा,जैसा तुम मुझे आज अपलक निहार रहे हो,वो मेरा दर्शन आज के दिन चन्द्र में पाएगा।
भक्ति रहस्य को आधुनिक पाश्चात्य सोच से ग्रसित पतित जन कल्पना के अतिरिक्त कुछ नहीं मानते, क्योंकि उनकी सोच निम्न केंद्रों तक ही है। ‘महारास’ को शरीर से परे आत्म स्तर पर भक्ति से परमानन्द समझने में उन्हें कठिनाई होना स्वभाविक है,जिन्होंने कभी धर्मग्रन्थों का अध्ययन ही नहीं किया और न ही धर्म को तत्व से समझने की कोशिश की।

परिचय–प्रख्यात कवि,वक्ता,गायत्री साधक,ज्योतिषी और समाजसेवी `एस्ट्रो अमल` का वास्तविक नाम डॉ. शिव शरण श्रीवास्तव हैL `अमल` इनका उप नाम है,जो साहित्यकार मित्रों ने दिया हैL जन्म म.प्र. के कटनी जिले के ग्राम करेला में हुआ हैL गणित विषय से बी.एस-सी.करने के बाद ३ विषयों (हिंदी,संस्कृत,राजनीति शास्त्र)में एम.ए. किया हैL आपने रामायण विशारद की भी उपाधि गीता प्रेस से प्राप्त की है,तथा दिल्ली से पत्रकारिता एवं आलेख संरचना का प्रशिक्षण भी लिया हैL भारतीय संगीत में भी आपकी रूचि है,तथा प्रयाग संगीत समिति से संगीत में डिप्लोमा प्राप्त किया हैL इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ बैंकर्स मुंबई द्वारा आयोजित परीक्षा `सीएआईआईबी` भी उत्तीर्ण की है। ज्योतिष में पी-एच.डी (स्वर्ण पदक)प्राप्त की हैL शतरंज के अच्छे खिलाड़ी `अमल` विभिन्न कवि सम्मलेनों,गोष्ठियों आदि में भाग लेते रहते हैंL मंच संचालन में महारथी अमल की लेखन विधा-गद्य एवं पद्य हैL देश की नामी पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित होती रही हैंL रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी केन्द्रों से भी हो चुका हैL आप विभिन्न धार्मिक,सामाजिक,साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े हैंL आप अखिल विश्व गायत्री परिवार के सक्रिय कार्यकर्ता हैं। बचपन से प्रतियोगिताओं में भाग लेकर पुरस्कृत होते रहे हैं,परन्तु महत्वपूर्ण उपलब्धि प्रथम काव्य संकलन ‘अंगारों की चुनौती’ का म.प्र. हिंदी साहित्य सम्मलेन द्वारा प्रकाशन एवं प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री सुन्दरलाल पटवा द्वारा उसका विमोचन एवं छत्तीसगढ़ के प्रथम राज्यपाल दिनेश नंदन सहाय द्वारा सम्मानित किया जाना है। देश की विभिन्न सामाजिक और साहित्यक संस्थाओं द्वारा प्रदत्त आपको सम्मानों की संख्या शतक से भी ज्यादा है। आप बैंक विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ. अमल वर्तमान में बिलासपुर (छग) में रहकर ज्योतिष,साहित्य एवं अन्य माध्यमों से समाजसेवा कर रहे हैं। लेखन आपका शौक है।

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