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आवारा बादल

राधा गोयल
नई दिल्ली
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आवारा बादलों का घुमड़ना अच्छा लगता है,
दिल करता है हम भी आवारा से बन कर
बादलों की तरह वादियों में घूमते रहें,
पर इतना आवारापन भी अच्छा नहीं होता कि दीवानगी की सारी हदें पार कर दे
बादलों, कुछ तो शर्म करो,
इतना भी मत बरसो कि धरती पर प्रलय ही ला दो।

तुम्हारी बेहिसाब आवारगी के कारण लाखों लोगों के घर बह गए,
उनके चेहरों की मुस्कुराहट गायब हो गई
केवल उनके ही नहीं,
हम जैसे मध्यमवर्गीय लोगों के चेहरे की मुस्कुराहट भी छिन गई है
इस महँगाई ने सबकी खुशियों के ऊपर पानी डाल दिया है,
ऐसे में दिल से सावन के गीत भी नहीं निकलते।

कैसे ‘मेघ मल्हार’ मैं गाऊँ, कैसे गाऊँ गीत प्यार के ?
कितने सपने पाल रखे थे,
लगता है, सब थे उधार के
कभी सुनते थे-‘दाल रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ’
लेकिन अब तो दाल भी बहुत भाव खा रही है,
और दाल क्या बिना टमाटर के बन सकती है ?
टमाटर कितना भाव खा रहे हैं,
दो सौ रुपए के एक किलो!
दाम सुनकर ही लोगों के चेहरे की खुशी काफूर हो जाती है,
गृहिणियों के चेहरे पर हर वक्त उदासी छाई रहती है
क्या बनाएँ और क्या ना बनाएँ!
सब्जियाँ और फल बेहद मँहगे,
घर का सारा बजट है बिगड़ा।

किसान ने खेती करना क्यों छोड़ा!
इस बारे में सोचना होगा
खेती की जमीन को औने-पौने में खरीद कर,
उन पर बड़े-बड़े फार्म हाऊस खड़े किए जा रहे हैं
कारण,
युवा गाँवों से पलायन कर रहे हैं
खेती करना ही नहीं चाहते,
उन्हें यह छोटा काम लगता है।

हमें शिक्षा में बदलाव लाना होगा,
बच्चों को खेती और हुनर की ओर उन्मुख करना होगा
आजकल हर कोई उच्च शिक्षा प्राप्त करके,
नौकरी की तलाश में ही भटकता है।
लेकिन नौकरी कितने लोगों को मिलती है ?

आधे से ज्यादा युवा बेरोजगार हैं,
और उनके कारण माता-पिता बेजार हैं
बच्चों के साथ साथ माता-पिता की मुस्कुराहट भी गायब हो गई है।

बादलों,
थोड़ा रुक कर बरसो
मौसम के अनुसार बरसो,
जहाँ सूखा है, वहाँ बरसो
इतनी आवारगी अच्छी नहीं होती,
जिसमें किसी का बसेरा उजड़ जाए
किसी की बसी-बसाई गृहस्थी में आग लग जाए,
तुम्हें देखकर तो लोग सावन में झूम उठते थे
लेकिन तुमने तो इस बार आवारगी की इतनी हद कर दी,
कि लोगों की खुशियाँ ही छीन ली
इसीलिए कहते हैं-
इतनी आवारगी भी अच्छी नहीं होती,
बरसो, जमकर बरसो।
पर इतना रौद्र रूप मत दिखलाओ,
कि लोग मुस्कुराना और ‘मेघ मल्हार’ गाना भूल जाएँ।