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इंसान के गिरने का कोई वक़्त नहीं

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया-३१…

एक कंजूस महिला ने अपनी वसीयत तैयार की, लिखा-मैं पुर्नजन्म में विश्वास करती हूँ, इसलिए यह वसीयत अपने नाम कर रही हूँ, ताकि मेरे द्वारा छोड़ी हुई सम्पत्ति अगले जन्म में मुझे ही मिले। बूंद-सा जीवन है इंसान का, लेकिन अहंकार सागर से भी बड़ा है। ये ज़िंदगी तब तक हल्की है, जब तक सारे बोझ माँ-बाप ने उठाए होते हैं। केवल खून के रिश्ते ही महत्वपूर्ण नहीं होते। मुसीबत में हाथ थाम लेने से बड़ा कोई रिश्ता नहीं। सच बोलना तो दूर की बात, आजकल लोग सच सुनना भी पसंद नहीं करते हैं। नियंत्रण जरूरी है यदि आमदनी कम हो तो खर्चों पर और जानकारी कम हो तो शब्दों पर।
  बहुत पढ़ाई कर ली, पर मैं भी कुछ सवाल हल नहीं कर पाया। यदि आपके पास इनके जवाब हों तो अवश्य बताइए-यदि भाड़ में जाना हो तो किससे जाएं पैदल, आटो या रेलगाड़ी से ? यदि किसी के पाप का घड़ा भर जाए तो दूसरा घड़ा कहाँ मिलेगा ? दिल पर जो पत्थर रखते हैं, वो कितने किलो का होना चाहिए। सभी लोग मेहनत की रोटी कमाना चाहते हैं, पर कोई भी मेहनत की सब्जी क्यों नहीं कमाना चाहता। और जले पर नमक छिड़‌कना हो तो कौन-सा अच्छा रहेगा-पतंजलि का या टाटा का ?   
    एक मोमबत्ती से हजारों मोमबत्तियाँ जल सकती हैं, वैसे ही एक विचार से हजारों जिंदगीयाँ बदल सकती है। छोड़ना था छल, कपट और पाप, पर हमने क्या छोड़ा-केवल लहसुन व प्याज। पति ने पत्नी से कहा – तुम्हारे हाथ की चाय पीते ही मेरी सारी थकान उतर जाती है। पत्नी भी हाजिर जवाब थी, उसने कहा-चाय पीने के बाद अगर कप धोकर रख दोगे तो तुम्हारे सारे बदन की सुस्ती दूर हो जाएगी। जब भी कुछ लिखें- सीमित शब्द हो, असीमित अर्थ हो, लेकिन इतना ही हो कि शब्दों से कष्ट न हो।     
      आज की सच्चाई-हाथों में फोन और दिलों में दूरी है, यही आज के रिश्ते की सबसे बड़ी मजबूरी है। अगर कोई आपसे मन की बात ‘शेयर’ करता है, तो आप समंदर बनना, ‘न्यूज़पेपर’ नहीं। अगर अपना अस्तित्व खोना है तो बड़े बनो, क्योंकि नदी बड़ी बनने के चक्कर में जब सागर से मिलती है, तो उसका मीठा पानी खारा हो जाता है। अजीब है यह दुनिया-जहाँ
हजारों अच्छाइयों की कोई रसीद नहीं मिलती, पर एक गलती का पूरा हिसाब रखा जाता है। पत्ते तो केवल पतझड़ के मौसम में ही गिरते हैं, परन्तु इंसान के गिरने का कोई वक़्त नहीं होता है। जहां फायदा देखता है, गिर जाता है। मूल्य वस्तुओं का नहीं होता है, बल्कि हमारी जरूरत उन्हें मूल्यवान बना देती है।
   इंजीनियरिंग कालेज में दाखिले का फार्म भरते हुए एक छात्र ने पास खड़े चौकीदार से पूछा- कैसा है यह कालेज ? चौकीदार ने तपाक से उत्तर दिया, बहुत बढ़िया, मैंने भी इसी कालेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। दुनिया में सबसे संतुष्ट गंजा आदमी होता है, क्योंकि उसकी ना कोई मांग होती है और ना कोई उसका बाल बाँका कर सकता है। एक शराबी मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुंचा, उसने यमराज से प्रश्न किया मैं सारा दिन नशा करता था, उसके बाद भी मुझे स्वर्ग कैसे मिला ? यमराज ने उत्तर दिया – तुम रोज बिना दाना खाए सलाद के साथ शराब पीकर सो जाते थे-उसे हमने उपवास माना है। रावण में लाख बुराइयाँ थी, परन्तु उसने कभी भी दान पेटी से पैसे नहीं चुराए थे। अच्छा था कि भगवान राम की सेना में वानर थे, ये मंदिर वाले होते तो सोने की लंका देखकर रावण की साईड हो जाते।*
  साँप के दाँत में, बिच्छू के डंक में और इंसान के मन में कितना ज़हर भरा है, यह कोई नहीं बता सकता है। जब भी कोई समस्या हो, मौन हो जाइए, बहुत कुछ सुनाई भी देगा और और दिखाई भी देगा। रोटी कमाने वाला भी थकता है और रोटी बनाने वाला भी थकता है, इसलिए रिश्तों में तुलना नहीं, सम्मान होना चाहिए। एक बात हमेशा ध्यान रखें-बीबी सब कुछ बर्दाश्त कर सकती है, लेकिन लड़ाई के बाद चैन से सोते पति को नहीं। आज के युग में उधार लेना एक ‘कला’ है, उसे नहीं लौटाना उससे भी बड़ी ‘कला’ है। मैं ठीक हूँ, यह तो हम किसी से भी कह सकते हैं, लेकिन मैं परेशान हूँ, ये कहने के लिए कोई बहुत खास चाहिए।
काश मोहब्बत को मापने का कोई पैमाना मिल जाए,
तो मुझ पर लगा बेवफा का दाग धुल जाए।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |