नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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चाँद उदित हो कर नभ में,
कुछ ताप मिटाता जीवन का।
लहरा-लहरा कर ये शाखाएं भी,
कुछ सोख मिटा देती मन का।
कल मुरझाने वाली कलियाँ भी,
कहती है मगन रहो मगन रहो।
बुलबुल भी गान सुना कर कहती,
मदमस्त रहो-मदमस्त रहो।
उस पार मुझे बहलाने का,
उपचार ना जाने क्या होगा।
ऐसा सुनता उस पार प्रिय,
ये सब साधन भी छिन जाएंगे।
तब मानव का चेतनता का,
आधार न जाने क्या होगा।
कह तो सकते हैं कह कर भी,
कुछ दिल हल्का कर लेते हैं।
उस पार अभागे मानव का,
अधिकार ना जाने क्या होगा।
अब तो हम अपने इस जीवन के,
क्रूर कठिन को कोस चुके।
उस पार नियति का मानव से,
व्यवहार ना जाने कैसा होगा॥