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ईश्वर सर्वत्र है

राजबाला शर्मा ‘दीप’
अजमेर(राजस्थान)
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ईश्वर और मेरी आस्था स्पर्धा विशेष…..

खड्ग उठा हिरण्यकश्यप बोला,
“अपने ईश्वर का परिचय बतला।”
स्थिर मन प्रहलाद ने उत्तर दिया,
“वह सर्वज्ञ है,सर्वत्र है,सर्व व्यापक है,
वह कहां नहीं है,यह मुझको तू बतला।
जैसे कि हिरण की नाभि में कस्तूरी,
पुष्प में पराग की गंध
अग्नि में उष्णता,
जल में शीतत्व
विद्वान में द्यृति,
नारियों में शील
पवन में प्रवाहमानता,
वैसे ही मेरा प्रभु पंचमहाभूतों में
सर्वत्र,सर्वकालिक,एवं सभी में विद्यमान है।”
उसके बिना तो पत्ता भी ना हिलता,
जो वह चाहे,वही वह करता।
लाख करें हम विज्ञ चतुराई,
उसके आगे एक चली ना भाई।
वैज्ञानिक भी मान रहे अब,
है एक महाशक्ति सबसे ऊपर।
पंछियों की चहचहाहट में,
बच्चों की खिलखिलाहट में
फूलों की मुस्कुराहट में,
भंवरे की गुनगुनाहट में
पूजन में,अर्चन में,
मंदिर की घंटी में
गुरुद्वारे,अज़ान में,
ऋषि-मुनियों के गुणगान में
ईश्वर ही ईश्वर है।
सृष्टि का रचयिता है,
मानव का पिता है
ईश्वर आस्था है,
ईश्वर विश्वास है।
ईश्वर श्रद्धा है,
ईश्वर महान है।
ईश्वर ज्ञान है,
हम सब उसकी संतान हैं॥

परिचय– राजबाला शर्मा का साहित्यिक उपनाम-दीप है। १४ सितम्बर १९५२ को भरतपुर (राज.)में जन्मीं राजबाला शर्मा का वर्तमान बसेरा अजमेर (राजस्थान)में है। स्थाई रुप से अजमेर निवासी दीप को भाषा ज्ञान-हिंदी एवं बृज का है। कार्यक्षेत्र-गृहिणी का है। इनकी लेखन विधा-कविता,कहानी, गज़ल है। माँ और इंतजार-साझा पुस्तक आपके खाते में है। लेखनी का उद्देश्य-जन जागरण तथा आत्मसंतुष्टि है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-शरदचंद्र, प्रेमचंद्र और नागार्जुन हैं। आपके लिए प्रेरणा पुंज-विवेकानंद जी हैं। सबके लिए संदेश-‘सत्यमेव जयते’ का है।

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