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एक संस्थान थे पं. विद्या निवास मिश्र

डॉ. दयानंद तिवारी
मुम्बई (महाराष्ट्र)
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पं. विद्या निवास मिश्र का सर्वाधिक मुख्य प्रदेय यह है कि आप भारतीय मनीषा और संस्कृति के आदिम स्वरूप से लेकर अधुनातन विकास सोपानों का गहन और विवेक सम्मत अध्ययन करते रहे हैं। संस्कृत, अंग्रेज़ी, हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य के आप अधिकारी विद्वान् हैं। पंडित जी साहित्य में विशाल वटवृक्ष की तरह थे, जिसकी छाया में कितनों को विश्राम व आश्रय मिला था। उनकी आस्था की जड़ें पाताल से रस ग्रहण करती थी। पत्तियां हवाओं से भी जीवन वायु खींच लेती थी। विद्या और प्रभा का ऐसा मिलन साहित्य में विरल ही दिखाई देता है। इतनी विद्या साहित्य में कहां से और कैसे आती है, बस सोच ही सकते हैं। जीवन और व्यवहार के प्रति दृढ़ता, निश्चलता तथा निष्ठा और तमाम वैचारिक झंझावतों के बीच में निष्कंप बने रहे। वे विचार की गहनता को भारतीय चिंतनधारा से और गहनतर,सूक्ष्म तथा मारक करते चले गए। अनगिनत समस्याओं का समाधान इस विस्तृत भू-भाग में रचित-वसित सहस्रों वर्षों के साहित्य, संगीत, कला, व्याकरण, भाषा विज्ञान, दर्शन और लोक से पाते थे। पश्चिम की वैचारिक क्षणभंगुरता के प्रति ऐसी आश्वस्ति अन्यत्र दुर्लभ है। विचारों के उत्थान-पतन, उलझन- सुलझन, कटाव, तनाव और मोड़ों को भी वे खूब समझते थे। व्यष्टि और समष्टि के यात्रा पड़ावों का अनुभूत और व्यवहृत धरातल पर आत्मसातीकरण तथा प्रकटीकरण उनके रचाव-बसाव का अंग था। वे अपने तर्क संगत और वैदुष्य से साहित्यिक व सांस्कृतिक संपदा को आलोकित करते रहे। देश विदेश की अनगिनत यात्राओं ने आपके अनुभव विश्व को व्यापक बना दिया था।
राम और कृष्ण से जुड़े वैष्णव मार्ग की ऋजु-कुटिल यात्रा में जहां राम-सीता और लक्ष्मण के अनुसरण में आश्वस्ति की अनुभूति करते थे, वहीं बाँसुरी की मनमोहिनी तान के बीच पड़ावहीन, अंतहीन यात्रा के खतरे और साहस की चुनौतियों की सरस चर्चा करते थे।
उनके व्यक्तित्व में अनेक खूबियां रहीं हैं। पंडित जी अपनी पार्थिवता में अनुपस्थित, लेकिन अपने शब्दों में अमरता का गान करते हुए भले ही इस संसार से विदा हो गए हों, पर उनके कृतित्व में हम पाते हैं कि अपनी यायावरी में वे महापंडित राहुल सांकृत्यायन और सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ से कम नहीं थे। हर दिन उनके पांव कहीं न कहीं चलने को आतुर रहते थे। शायद यही वह कारण बना, उनके अंत का कि वह यात्रा में चलते-चलते ही चलते बने।
उन्होंने ‘डिस्क्रिप्टिव टेक्निक आफ पाणिनि’ पर पी-एच.डी की थी, किन्तु संस्कृत के अध्येता होकर भी अपने को गतानुगतिक नहीं बनाया। ‘पानी की पुकार’ कविता संग्रह पढ़ें तो पाते हैं कि उसमें आधे में उनकी कविताएं हैं और आधे में विदेशी कविता के अनुवाद हैं-भाव-रस और काव्य-बोध से पगे हैं। अनेक कवियों के अनुवाद जैसे उन्होंने किए हैं,वैसे अन्यत्र पढ़ने को नहीं मिलते। दूसरे यह कि विदेशी कवियों के हिंदी अनुवाद में उनकी खास दिलचस्पी रही है और ऐसी कुछ परियोजनाओं-माडर्न हिंदी पोएट्री, द इंडियन पोयटिक ट्रेडिशन आदि में वे शामिल भी रहे हैं। यह अत्यंत विलक्षण है कि खांटी भारतीयता के पोषक मिश्र जी वैचारिक दृष्टि से उतना ही मुक्त मन वाले थे और आग्रह से मुक्त होकर अन्य परंपराओं के साथ संवाद और समन्वय हेतु हमेशा प्रस्तुत रहते थे।
उन्होंने भारतीय अवधारणाओं के मूल्य श्रोतों को खोजा और उनकी प्रासंगिकता को स्पष्ट किया।
अपने देश में जहां तक व्यक्ति की ऊंचाई मापने का चलन हैं, हमारे यहां व्यक्ति का पद कद देखा जाता है,इस लिहाज से भी वे तमाम संस्थानों से संबद्ध रहे। देश-विदेश के विश्वविद्यालयों में अतिथि प्राध्यापक रहे, तो काशी विद्यापीठ के कुलपति भी रहे। नवभारत टाइम्स में प्रधान संपादक रहे, राज्य सभा के मनोनीत सदस्य रहे। पद्मश्री, पद्मभूषण व मूर्तिदेवी पुरस्कारों से सम्मानित हुए। तथापि यह परिचय उन जैसे व्यक्ति के लिए बहुत तुच्छ है, पर आज यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि वे अपने आप में एक लेखक,निबंधकार, वक्ताभर ही नहीं थे,पंडित जी एक संस्था‍न थे। भारतीय संस्कृति ,वांग्मय,सभ्यता के दिग्गज व्याख्याता थे।
पंडित जी की पहली पहचान निश्चय ही उनके ललित निबंध हैं,पर केवल ललित निबंध ही नहीं। पंडित जी ने कोई आत्मकथा नहीं लिखी,जो भी व्यक्त किया वह निबंधों में, चाहे वे व्यक्ति-व्यंजक हों ,साहित्‍यालोचनपरक या प्रभावाभिव्यंजक। उन्होंने अपने वैदुष्य को हल्का कर ललित निबंधों के प्रवाह में बह जाने दिया कि,आम जनता उनका रसास्वादन कर सके।
मन करता है कि मैं कहूं कि पंडित जी ललित निबंधकार भले माने जाते रहे हों,पर भीतर से वे कवि थे। कौन निबंधकार है भला जिसने हमारी परम्परा के कवियों को इतने भावपूर्ण ढंग से याद किया है। रसखान हों, विद्यापति हों, बिहारी हों, सबका भावपूर्ण स्मरण उन्होंने किया है। महाभारत का काव्यार्थ और भारतीय भाषादर्शन की पीठिका लिख कर उन्होंने अपनी समावेशिता का परिचय दिया, तो हिंदी की शब्द संपदा लिख कर शब्‍दों की व्युत्‍पत्ति में झांकने का सुअवसर दिया। कितने ही कोशों के वे नियामक रहे हैं, वे लोकभाषाओं की साहित्य संपदा के अनुरक्षक भी हैं।
अज्ञेय, ठाकुर प्रसाद सिंह, विश्वनाथप्रसाद तिवारी, कुंवर नारायण, कैलाश वाजपेयी, केदारनाथ सिंह, श्रीलाल शुक्ल, नामवर सिंह, डॉ. रामजी तिवारी, गोविंदचंद्र पांडेय, सुनीता जैन ऐसा कौन है-जो उन्हें प्रिय न हो, उनके निकट न रहा हो। अपने शिष्यों को उनकी योग्यतानुसार स्थापित करने में भी उन्होंने कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। पूरा देश ही उनके लिए गाँव-जवार जैसा था। यह केवल उनकी लेखकीय योग्यता या पांडित्य के चलते न था, उनके मानवीय व्यवहार और आचरण गत चरितार्थता में ही यह था कि हर व्यक्ति उनसे उपकृत महसूस करता था। प्रगतिशीलों में उनके प्रति आस्था भले न थी,पर नामवर सिंह जैसे प्रगतिशील ने भी उनकी मेधा और व्यक्तित्व की महनीयता को मान दिया।
उनकी कृतियों का संजाल विभिन्न विधाओं में फैला है। निबंध, यात्रा-वृत्तांत, कविता, साहित्यालोचन, संस्कृति संवाद, भाषा चिंतन, अनुवाद एवं भाष्य आदि। साहित्य की चेतना, निज मुख मुकुर, साहित्य का प्रयोजन, महाभारत का काव्यार्थ, साहित्य् का खुला आकाश, कालिदास से साक्षात्कार, भावपुरुष श्रीकृष्ण आदि कृतियां उन्होंने दी हैं।
वे बार-बार समष्टि का आग्रह करते दिखते हैं। निजता के खोते जाने का, भोग से विरक्त होते समाज को समर्पित होने की ललक से जुड़ते जाने की प्रक्रिया में अंतर्निहित होने का भाव बहाव उनमें प्रमुख रहा है। इसीलिए संतों की जंगमता की प्रशंसा करते हैं, कुंभ और उससे जुड़ी आस्था का समर्थन एवं अनुमोदन करते हैं। भोग के ऊपर के नियंत्रण के कारण संत और फकीर को सम्मानित करते हैं। ऐसे विद्वान मनीषी के बहु आयामी व्यक्तिव का परिमापन सरल नहीं है,ये केवल कुछ रेखाएं हैं,जिन्हें प्रस्तावना के रुप में खींचा है।

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