डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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सतरंगी दुनिया-४१…
हमेशा सच बोलने की आदत डालिए, फिर आपको कुछ भी याद रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अगर झूठ बोलेंगे तो याद रखना पड़ेगा कि किससे, क्या बोला था। शिक्षा हमें अंगूठे के निशान से हस्ताक्षर तक ले गई, परंतु तकनीक हमें फिर हस्ताक्षर से अंगूठे पर ले आई। हमारे देश के आधे से ज्यादा रिश्ते तो उधार दिए हुए पैसे वापस माँगने पर ही टूट जाते हैं। पुरानी फिल्मों की तरह ही अगर बेइज्जती होने से हार्ट अटैक आता तो अब तक प्राइवेट नौकरी वाला महीने में ५-१० बार तो मर ही जाता।
कौन कहता है कि देश में पर्दा प्रथा खत्म हो गई है। पुराने जमाने में स्त्रियाँ पर्दा करती थीं, आजकल स्त्रियों ने पर्दा करना बंद किया है तो अब हम घरों में पर्दा लगाने लगे हैं।
गणित से परेशान एक विद्यार्थी ने गुरु जी से पूछा-अगर शून्य की खोज आर्य भट्ट ने की थी, और उसका जन्म कलयुग में हुआ तो उससे पहले १०० कौरव एवं रावण के १० सिर की गिनती किसने की थी ? गुरु जी अवकाश लेकर उत्तर की खोज में भटक रहे हैं।
पति और पत्नी टी.वी. में मैच देख रहे थे, अचानक खबर आई-बरसात के कारण आज का मैच रद्द किया जाता है। तो पति भड़क गया और बोला — ऐसे कैसे रद्द ? बरसात तो मेरी शादी में भी आई थी। यदि किसी को खुश देखकर आप ख़ुश होते हैं तो यकीनन आप एक खूबसूरत इंसान हैं। अपनी गलती पर हँसना आपकी उम्र बढ़ा सकता है, परन्तु पत्नी की गलतियों पर हँसना आपकी उम्र घटा सकता है। अपने दिमाग़ को खूब पढ़ाइए, लेकिन दिल को हमेशा अनपढ़ रखिए, ताकि वो भावनाओं को समझने में हिसाब-किताब ना करे।
दुआओं में बड़ी शक्ति होती है, इनकी ताकत को कम मत आँकिए।यह वह खामोश ऊर्जा है, जो असम्भव कार्य को सम्भव कर देती है। बचपन में माँ बोलती है- तुम्हें समझ में नहीं आ रहा है। बाद में घरवाली बोलती है- आपको समझ में नहीं आ रहा है। बुढ़ापे में बच्चे बोलते हैं – आपकी समझ में नहीं आ रहा है। मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आखिर समझने की उम्र कौन- सी है ?
कल मेरे खेत से सोना निकला तो सारा सोना सरकार ले गई और आज मेरे खेत से एक बंदूक निकली तो सरकार मुझे ले गई जेल में। सहने वालों को अगर सब्र आ जाए तो कहने वालों की औकात दो कौड़ी की हो जाती है।
जरा-सी बात से मतलब बदल जाते हैं यहाँ, अगर ऊँगली उठे तो बेइज्जती और अंगूठा उठे तो तारीफ़। इस दुनिया में हर रिश्ता रिचार्ज जैसा है, जब तक बैलेंस है- तब तक लोग सम्पर्क में रहते हैं।
उलझनें मीठी भी हो सकती है, जलेबी इस बात का प्रमाण है। जीवन में सबसे शक्तिशाली हमारी सोच है, जो किसी भी परिस्थिति को बदलने की ताकत रखती है। इसलिए हमेशा पॉजिटिव सोचें और ख़ुश रहें।
कलियुग का असर देखिए— जूते शो-रूम में बिक रहे हैं और किताबें फुटपाथ पर बिक रही हैं, शराब दुकानों में नकद और दूध उधार गली-गली में, कुत्ते महलों में और गाय सड़क पर, बच्चे विदेश में और माँ-बाप वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। हमेशा मुस्कुराते रहिए, क्योंकि हँसता हुआ चेहरा आपकी शान बढ़ाता है और हँसकर किया हुआ कार्य आपकी पहचान बढ़ाता है। अपनी कमाई का १० प्रतिशत कम से कम अपने शौक पूरे करने पर करें। गृहस्थी तो चलती रहेगी। बैंक बैलेंस कितना भी कर लो, अंत में औलाद को कम ही लगेगा। हम इस दुनिया में ज़िंदगी जीने आए हैं, सात पीढ़ियों का बंदोबस्त करने नहीं आए हैं।
यदि आप जीवन में खुश रहना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपना ये भ्रम छोड़िए कि सब अपने हैं। श्राद्ध पक्ष चल रहा है, ध्यान दीजिए- अभी तक स्वर्ग के लिए कोई टिफिन सेवा शुरू नहीं हुई है। माता-पिता को जीते-जी सुख देना ही वास्तविक श्राद्ध है। नई अलमारी में पुस्तकों ने आत्महत्या कर ली और सुसाइड नोट में आरोपी का नाम मोबाइल लिखा।
उन्होंने मुझे पढ़ा अखबार समझकर, और बेच दिया रद्दी समझकर।
परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |