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आकर जग की पीर हरो

राधा गोयल
नई दिल्ली
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आज तेरे चरणों में भगवन विनती करने आई हूँ,
धूप दीप नैवेद्य नहीं है, याचक बनकर आई हूँ।

दुख में कभी ना हिम्मत हारूँ, मुझको ऐसा साहस दो,
कर्महीन सपनेहुँ सुख नाहीं, गीता ज्ञान पुनः दे दो।

जब-जब विपद पड़ी भक्तों पर, तब-तब तुझे पुकारा,
मेरे मोहन तूने आकर फौरन दिया सहारा।

सदा रहा तू खुद पीड़ा में, जाने पीर पराई,
तेरे बिना इस धरती पर अब हमारा कौन सहाई ?

खुद अपने जीवन में तूने कभी नहीं सुख देखा,
लेकिन तेरे मुख पर कभी न देखी दु:ख की रेखा। 

बचपन में मामा ने तुझ पर क्या-क्या जुल्म न ढाए, 
तुझे मारने के लिए कितने षड्यंत्र रचाए!

दूध पिलाने के बहाने पूतना राक्षसी भिजवाई,
तेरे हाथों मारी गई, जो तुझे मारने आई।

कालिया नाग को नाथ के, ब्रजवासियों की पीर मिटाई,
गौ संवर्धन की महत्ता तूने ही सबको समझाई।

अपने जीवन में प्रभु तुमने एक दिन सुख नहीं पाया,
कदम-कदम पर विपदाओं ने आकर तुझे सताया।

कितनी ही विपदाएं आईं, तेरे आगे हारीं,  
कितनी महिलाओं की रक्षा तुमने करी मुरारी।

आज धरा पर जगह-जगह आतंक मचा है भारी,
आकर जग की पीर हरो तुम मेरे कृष्ण मुरारी।

शठ को शठ की भाषा में अब आकर के समझाओ,
दुराचार-आतंकवाद के त्रास से मुक्ति दिलाओ॥