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मन की बुरी प्रवृत्तियों पर विजय पाना ही दशहरे का सही आनंद

पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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भीतर का रावण (विजयादशमी विशेष) …

विजयादशमी के दिन मैदान सजते हैं मेले लगते हैं, रामलीला होती है, और शाम होते ही रावण एवं कुंभकरण के विशाल पुतले आग की लपटों में बदल जाते हैं। रावण और कुंभकरण का पुतला जला कर हम तत्काल खुश हो जाते हैं, परंतु क्या यह आभासी खुशी नहीं है ?, जो हमें फेसबुक पर लाइक्स पाकर मिलती है! फिर अगले दिन से हमारा जीवन उसी गति से चल पड़ता है। वही रोज वाला तनाव, क्रोध, आपसी मनमुटाव, ईर्ष्या, अहंकार, नशा, मोबाइल पर अनावश्यक समय बिताना, आपसी रिश्तों में संवाद की कमी और वही रोज की दिनचर्या।
हम सब विचार करें, कि क्या हम लोग सच में रावण को  जला पाते हैं ?
रावण को केवल राम के सामने खड़े एक पौराणिक पात्र के रूप में देखने की बजाए हम उसे अपने अंदर मौजूद उन सभी प्रवृत्तियों का प्रतीक मान सकते हैं, जो हमारे निर्णयों, व्यवहार, रिश्तों और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। इसलिए-
◾गुस्से से विराम लें – 
  जिस समय हम क्रोधित होते हैं, उस समय हम पूर्ण रूप से विनाशकारी व्यवहार करते हैं। उस समय हमारा क्रोध रिश्तों, काम और जीवन की गुणवत्ता पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। यहाँ एक व्यवहारिक नियम बहुत उपयोगी हो सकता है, कि हम गुस्से में कोई भी निर्णय नहीं लें। उस समय केवल  गुस्से पर विराम लगाएं।
◾लोभ की अंतहीन दौड़ –
    आज सभी बढ़िया घर, गाड़ी, कॉलेज, अच्छे जीवन की दौड़ में लगे हुए हैं, जिसकी कोई सीमा ही नहीं है। लोभ केवल धन का ही नहीं होता है, वरन् अधिक प्रतिष्ठा, प्रशंसा, लाइक्स, फॉलोवर्स का है, और अधिक सफलता पाने के लोभ ने सभी को घेर रखा है।
   समस्या तब होती है, कि उपलब्धि का आनंद लेने की बजाय हम और अधिक की चाह में ही लगे रहते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से कृतज्ञता और संतोष महत्वपूर्ण सुरक्षात्मक तत्व हो सकते हैं।
इसका अर्थ है महत्वाकांक्षा तो जरूर रखें, लेकिन अपने मन की शांति की कीमत पर नहीं।
◾अहंकार और आत्मसम्मान –
यह २ अलग चीजें हैं- मैं हमेशा ठीक बोलता हूँ, सही काम करता हूँ। मैं कभी  गलत हो ही नहीं सकता…। आपकी यही एक लाइन आपसी रिश्तों के बीच में दुराव और टूटन का कारण बन सकती है। मनोवैज्ञानिक रूप से आत्मसम्मान और अहंकार में फर्क करना आवश्यक है। आत्मसम्मान कहता है कि मैं इस दुनिया में सबसे मूल्यवान और सही हूँ, लेकिन दूसरा व्यक्ति भी मूल्यवान और सही है, जबकि अहंकार कहता है कि केवल मैं ही मूल्यवान हूँ और मैं दूसरों से ऊपर हूँ। वरन् सच तो यह है कि मैं सबसे ऊपर हूँ।
◾दूसरों की खुशी से दुखी क्यों ?      
      हम शायद कभी किसी से नहीं कहते, कि मैं तुमसे ईर्ष्या करता हूँ लेकिन हमारे अंदर ही अंदर दूसरों को देखते ही तुलना चलती रहती है- इसकी गाड़ी ज्यादा मँहगी है, मकान ज्यादा सुंदर है, लेकिन सच तो यह है कि सामाजिक तुलना पूरी तरह से समाप्त नहीं हो सकती, परंतु हम सीख सकते हैं कि तुलना को कौन- सी दिशा दी जाए।
   अगली बार जब मन में ईर्ष्या का भाव आए तो ईर्ष्या से ही पूछना कि आखिर तुम क्या बताना चाह रही हो।
◾लगाव निर्भरता न बने –    
    मोह को समझना कठिन है, क्योंकि यह प्रेम का आवरण लेकर आता है। जीवन साथी, बच्चे, घर इनसे सबको मोह होता है, लेकिन जब हम सोचते हैं कि पति हमें छोड़ देगा तो मैं कुछ भी नहीं हूँ। बेटा-बेटी मेरी बात नहीं मानते हैं, इसलिए मेरा जीवन ही बेकार है। नौकरी चली गई तो मैं खतम ही हो जाऊँगा। ऐसे व्यक्ति की पहचान बाहरी चीजों से बँध जाती है, जबकि स्वस्थ प्रेम में निकटता होती है लेकिन स्वतंत्रता य़ा आत्मबोध भी होता है।
◾द्वेष और क्षमा ना कर पाना –  
  किसी ने आपको अपशब्द कहे, चोट पहुँचाई, विश्वास तोड़ा, यह घटनाएं हमारे मन से कभी हटती ही नहीं है। यह बार-बार हमारे मन में नकारात्मक भावनात्मक अनुभव को चोट की तरह बनाए रख सकता है। यह स्वाभाविक भी है, लेकिन आवश्यकता है क्षमा करने की। क्षमा का तात्पर्य है कि हम उस घटना को अनिश्चितकाल तक अपने मन पर शासन करने की अनुमति न दें। आप माफ करके उस व्यक्ति से दूरी बना सकते हैं।
◾झूठ और आत्म छल –
  झूठ केवल दूसरों से ही नहीं बोला जाता है, वरन् स्वयं से छल करके भी बोला जाता है। आपके गुस्से से आपका परिवार प्रभावित हो रहा है, लेकिन आप खुद से कहते रहते हैं कि मेरी वजह से यह नहीं हो रहा है। रिश्ता खराब हो चुका है, लेकिन हम छल से कहते हैं सब ठीक तो है।
व्यक्ति को स्वयं के प्रति ईमानदार होना जरूरी है। ईमानदारी का मतलब स्वयं को दोष देना नहीं है।
◾आलस्य और टालमटोल –   
  आलस्य का मनोवैज्ञानिक पहलू है कि हमारा मन तत्काल आराम या सुख को प्राथमिकता देता है। परीक्षा की तैयारी का फल बाद में मिलेगा, लेकिन मोबाइल पर गेम खेलने का आनंद तत्काल मिलने वाला है। बस हम लोग इसी भूल-भुलैया में भटकते रहते हैं।
   दरअसल, बदलाव के लिए वातावरण और व्यवहार संरचना बदलनी पड़ती है। व्यवहार में छोटे दोहराए जाने वाले संकल्प अधिक उपयोगी हो सकते हैं।
◾भय और असुरक्षा –
  डर अपने-आपमें कमजोरी नहीं है, लेकिन जब हम सोचते हैं कि यदि विफल हुए तो क्या होगा… लोग हँसेगें तो… रिश्ता टूट गया तो… अगर मैं नहीं कर पाया तो…। इस भय के कारण हम अगला कदम उठाने से ही डरते हैं, परंतु यह भय हम पर हावी हो जाता है तो हमारे आगे बढ़ने का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। इसलिए हमें इसे मन से निकाल देना चाहिए।
◾नकारात्मक सोच –

   हम सभी के मन के अंदर अनेक विचार चलते रहते हैं। जब हम विफल होने पर सोचते हैं, कि अपनी तैयारी पर पुनः विचार कर शैली में सुधार करेंगें, तब तो हमारे आगे बढ़ने का रास्ता बचा रहता है, किन्तु जब सोचते हैं कि मैं यह कर ही नहीं सकता तो आपको ऐसे विचारों से दूरी बनाने की जरूरत होती है।
       इस प्रकार हम अपने मन की  बुरी प्रवृत्तियों पर विजय पाकर ही असत्य रूपी रावण का दहन करके सत्य पर विजय प्राप्त करने के बाद दशहरे का सही अर्थ में आनंद ले सकते हैं।