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ओ मानव! तू कितना ढोंगी

शशि दीपक कपूर
मुंबई (महाराष्ट्र)
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ओ मानव! तू कितना ढोंगी,
ओढ़ चादर लोलुपता की
तू आगे बढ़ता जाता।

अन्तर्मन की महत्वाकांक्षा को,
मृदुल भावों का हार पहनाया
प्रपंचों-आडंबरों का तू नित्यानंद,
कैसे पल-पल समय गंवाता ?

अर्थहीन विकारों में
जीवन-माधुर्य को अवसाद घोल पिलाता
शुचि संवेदनाओं में जागृत स्पंदन को,
छल-छल कर मकड़ जाल बनाता।

ओ ढोंगी मानव,
देख! सुन मत हो मूक-बघिर
देख! तेरी ही वेदना,
तुझे शून्य ठहराती
भावहीन दिशाहीन, अविवेकी बतलाती।

ऐ मानव!
तू क्यूं अनमोल,
शाश्वत भावों से है दूर भागता
गा एक स्वर में गीत,
‘बुद्धम् शरणम् गच्छामि।’
मिलेंगे उस पथ पर,
राम, रहीम, नानक व महावीर स्वामी भी॥
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