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कर्म को ही धर्म और मानव मूल्यों को समझने की जरूरत

राधा गोयल
नई दिल्ली
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आनंद लूट ले बंदे, तू प्रभु की बंदगी का,
न जाने छूट जाए, कब साथ जिंदगी का।
क्या धर्म का यही मर्म है कि प्रभु की बंदगी करते रहो। अजी आपने गलत समझ लिया।
प्रभु की बंदगी का मतलब यह नहीं है कि उनके चित्र रखकर पूजा-पाठ करते रहो। यह तो कोरा दिखावा है। प्रभु की सच्ची बंदगी है…दीन-दुखियों की सेवा करना, हर प्राणी के काम आना, हर प्राणी से प्रेम करना
हर प्राणी में ईश्वर को देखना, क्योंकि सुना होगा-
मैं जीव हूँ ,तू ब्रह्म है
मैं तुझमें हूँ, तू मुझमें है
और भी
तुझमें राम मुझमें राम, सबमें राम समाया,
सबसे कर ले प्यार जगत में कोई नहीं है पराया रे।’
यदि यह सोचोगे ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ तो हमेशा याद रहेगा कि मैं उस परमपिता परमात्मा का एक अंश हूँ। मैं आत्मा हूँ, वह परम आत्मा है। ईश्वर की सच्ची पूजा है…हर प्राणी से प्यार करना…, ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत पर चलना।
आज दुनिया में कितने युद्ध हो रहे हैं। युद्ध की विभीषिका की आग से धरती सुलग रही है, विलाप कर रही है। लोगों का क्रंदन आसमान का सीना फाड़ रहा है। धनलोलुप, सत्तालोलुप और कुछ देशों की अति विस्तारवादी नीतियों के कारण आज मानवता कराह रही है। समझ नहीं आता, क्यों कोई देश दूसरे देश को हथियाने की सोचता है ? न खुद चैन से जीता है, न दूसरों को चैन से जीने देता है। यह नहीं सोचता युद्ध में केवल उस देश के सैनिक ही नहीं मरेंगे, जिस पर हमला किया गया है, उसके अपने सैनिक भी मरेंगे। एक सैनिक का मरना उसके पूरे परिवार का मरना है। कितनी ही औरतों का विधवा हो जाना है। कितने ही बच्चे का अनाथ हो जाना है। कितने माँ-बाप की लाठी का टूट जाना है।
क्यों नहीं, पूरा विश्व इस धरती को कुटुंब के समान समझता है, जैसी हमारे मनीषियों की अवधारणा थी ‘वसुधैव कुटुंबकम’।
धनलोलुप लोग धरती का बेहिसाब दोहन कर रहे हैं। वृक्षों को काट रहे हैं। कांक्रीटों के महल खड़े कर दिए हैं, जिसके कारण पर्यावरण संतुलन बिगड़ गया है। कहने को धरती पर चारों तरफ पानी ही पानी है, लेकिन पीने का पानी नहीं है। आज वसुधा को कुटुम्ब समझने की बहुत जरूरत है। हमारे ऋषियों द्वारा स्थापित मानव मूल्यों को समझने की जरूरत है।
ठीक है कि किसी भी देश को अपनी सैन्य शक्ति मजबूत करनी बहुत जरूरी है, ताकि कोई देश दूसरे देश की ओर गलत निगाह से न ताक सके, लेकिन अपनी इस ताकत को विनाश के काम में नहीं लगाना चाहिए। शक्तिशाली बनो, लेकिन किसी की रक्षा करने के लिए, न कि किसी को दबाने या कुचलने के लिए।
हमारे ऋषि-मुनियों ने आज से हजारों वर्ष पूर्व न जाने कितने ही प्रक्षेपास्त्र बना लिए थे, लेकिन कभी गलत इस्तेमाल नहीं किया, न ही गलत व्यक्तियों को दिया। जंगलों में अपने अनुसंधान कार्य में लगे रहते थे। वनों में ही उनके आश्रम होते थे, जहाँ वे विद्यार्थियों को शिक्षा का दान देते थे। उनके लिए वही सच्चा धर्म था और वास्तव में यही सच्चा धर्म है।
हाथ में माला लेकर, आँखें बंद करके जाप करने का नाम जप या धर्म नहीं होता। धर्म तो कहता है कि ‘जियो और जीने दो।’
सूर्य अपना प्रकाश किसी का मजहब पूछकर नहीं देता। चंद्रमा मजहब पूछ कर अपनी शीतल चाँदनी से लोगों को नहीं नहलाता। वृक्ष किसी का मजहब पूछ कर फल-फूल और छाँव नहीं देते। ये सभी अपने कर्म को अपना धर्म समझते हैं। यदि हमें सीखना है तो इनसे सीखें। जिस दिन सूरज उगना छोड़ देगा, चाँद रात को निकलना छोड़ देगा, धरती अपनी धुरी पर घूमना बंद कर देगी, नदी बहना छोड़ देगी तो कभी सोचा है कि धरती पर जीवन कैसा होगा ? जीवन बचेगा ही नहीं। त्राहि-त्राहि मच जाएगी। इसलिए समय रहते यह समझो कि, धर्म क्या है और किसमें है।
धर्म के मर्म को समझें, कर्म के मर्म को समझें, कर्म को ही धर्म समझें। जगत में कुछ रचनात्मक काम करके, अंधेरे घरों को रोशनी देकर, हर हाथ को काम, हर प्राणी के लिए रोटी, कपड़ा और मकान और रोजगार के साधन मुहैय्या करके अपना जीवन सफल बनाएँ।

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