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काना-फूसी कर रही लताएँ

डॉ. कुमारी कुन्दन
पटना(बिहार)
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उमड़-घुमड़ कर गर्जन करती,
आई, काली घटा घनघोर
छम-छमा-छम कर धरा पर,
बूँदें बरस पड़ी चहुँ ओर।

सौंधी-सौंधी खुशबू आए,
सर्र-सर्र, सर्र-सर्र चले पवन
मनभावन सावन को पाकर,
बहका-बहका हो गया मन।

दृश्य लग रहा बड़ा मनोरम,
धरा गगन का हो रहा मिलन
महक उठा है वन उपवन,
झूम रहा जन-जन का मन।

नदियाँ, ताल, झील उपलाए,
वर्षा का जल भर-भर आए
मेंढक टर्र-टर्र शोर मचाए,
खग-वृंद उड़े पंख फैलाए।

काना-फूसी कर रही लताएँ,
मन्द-मन्द कलियाँ मुस्काएं।
हरियाली छाई चहुँ ओर,
तीज, कजरी करे भाव विभोर॥

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