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कामिनी

पूजा हेमकुमार अलापुरिया ‘हेमाक्ष’
मुंबई(महाराष्ट्र)
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शादी के रिश्तों ने अपनी दस्तक कामिनी की १२ वीं की परीक्षा से पहले ही दे दी। ना जाने कहाँ-कहाँ से रिश्ते आए,मगर कभी घर पसंद नहीं आता तो कभी लड़का..। ये सिलसिला लगभग डेढ़-दो साल तक यूँ ही चलता रहा। मम्मी को भी यही चिंता सताती कि कहीं अच्छा लड़का मिल जाए तो स्नातक की पढ़ाई पूरी होने पर हाथ पीले कर देंगे। मगर कभी ये तो कभी वो,कहीं बात जमती नजर नहीं आ रही थी पापा को। कामिनी की खुशियों और उज्जवल भविष्य की चिंता उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।अक्सर यही सोचते कि समय रहते बेटियों को विदा कर दिया जाए तो समाज में हँसी का पात्र नहीं बनना पड़ेगा,पर जब तक नौकरीपेशायुक्त, समझदार,विवेकशील,जिम्मेदार और भावी जीवनसाथी के विचारों- भावनाओं आदि को समझने वाला लड़का न मिले तो कैसे बेटी ब्याही जाए! पिता का कर्तव्य है उसे अच्छी तालीम देना, इस योग्य बनाना कि वह जीवन की हर परिस्थिति बिना हारे पूरे आत्मविश्वास और स्वाभिमान के साथ जीवन-यापन कर सके। एक बेटी का पिता होना गर्व और सम्मान की बात है लेकिन उसके लिए योग्य वर खोजना जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी ही नहीं,अपितु चुनौती भी है। वर पक्ष को परखे बिना किसी निश्चय पर पहुँचना!देखते ही देखते कामिनी की बारहवीं की परीक्षा भी हो गई और परीक्षा परिणाम भी आ गया। अच्छे अंक मिलने के कारण शहर के नामी महाविद्यालय में दाखिला मिल गया।रक्षाबंधन का अवसर था,कामिनी की बुआ जी घर पर आईं हुईं थीं। बातों-बातों में पापा ने बुआ जी से कहा,- “दीदी कहीं कोई लड़का और अच्छा परिवार हो तो कामिनी के लिए जरूर बताना।”
तभी बुआ जी को याद आया कि उनकी नजर में एक लड़का है। भला परिवार है,शिक्षित और संपन्न घराना है। अगर उस घर में शादी की बात बन जाए तो लड़की राज करेगी। कभी किसी भी तरह की कोई कमी और असुविधाओं का सामना नहीं करना पड़ेगा।
पापा ने भी पूछा,-“कौन है वह ?”
तुम जानते हो। तुमने देखा है,उस लड़के को। बुआ जी ने मुस्कुराते हुए कहा। पापा कुछ सोच में पड़ गए। दीदी किस लड़के की बात कर रही हैं। (मन में सोचते हुए)पापा ने कहा-“दीदी किस लड़के की बात कर रही हो आप ?”
बुआ जी ने बताया,-“अपनी मोहिता की ननंद का बेटा है। पढ़ा-लिखा है, अच्छी नौकरी पर भी है।”
“नाम…?“ पापा ने बड़ी उत्सुकता सें पूछा।
“उसका नाम हार्दिक है। याद आया क्या ? नीरू की शादी में कितनी भागदौड़ की थी उसने। शादी में सभी रिश्तेदारों का मन मोह लिया था। बड़ा ही भला है वह।”
“हाँ! हाँ! दीदी कुछ-कुछ याद आ रहा है,किस हार्दिक के बारे में बात कर रही हो आप। सच में बड़ा ही सुलझा और समझदार लड़का है,लेकिन नीरू की शादी को पाँच-छह साल हो चुके हैं, क्या हार्दिक का कहीं रिश्ता नहीं हुआ ? दीदी पता लगाओ इस विषय में।” बड़ी उम्मीद से पापा ने बुआ जी से कहा।
हार्दिक का नाम सुनते ही कामिनी की जैसे पाँच-छह साल पुरानी सभी यादें ताजा हो गई। ऐसा लगने लगा कि जैसे कल ही की बात हो। कामिनी को आज भी याद है कि नीरू दीदी की शादी में वे तीन दिन पहले ही पहुँच गए थे,मगर जब वे बुआ जी के घर पहुँचे तो हार्दिक पहले से ही कामिनी दीदी और जीजाजी के साथ वहाँ आ चुके थे। हार्दिक को पहली बार देखकर ऐसा लगा कि कुछ अकड़ू और घमंडी किस्म का लड़का है। रंग-रुप में कोई कमी न थी। उसकी चहलकदमी,सभी से हँसकर मेल-मिलाप करना और आगे-आगे काम करने की बात ने सबका मन मोह लिया था।
कामिनी कुछ शर्मीले स्वभाव की थी, किसी से ज्यादा बोलना-चलना पसंद ना था,मगर हार्दिक ने तो जैसे ठान ही लिया था कि कामिनी से बात करके ही रहेगा। उसने अपनी छोटी-छोटी और बचकानी हरकतें शुरू कर दी,जो कि कामिनी को कतई पसंद नहीं आती।
खाते समय कामिनी की ही थाली में खाने के लिए आ धमकना,संगीत के समय उसे नाचने के लिए तरह-तरह से आग्रह करना। भाभियों के साथ बैठा देखकर वहीं बातें करने बैठ जाना।
छोटी भाभी से कामिनी का लगाव कुछ ज्यादा ही था। उनके साथ खरीददारी करना और वक्त बिताना उसे अच्छा लगता। खरीददारी पर जाते समय हार्दिक पीछे-पीछे आ जाता,ये सारी बातें उसे अटपटी-सी लगती है,मगर उसके लिए जैसे यह सब कुछ मजाक ही था।
ये उम्र का ऐसा मोड़ था जहाँ पैर फिसलते देर न लगती है,मगर अपने को संभालना कहीं ज्यादा जरुरी था। उसे पता था हार्दिक चाहे जो कुछ भी कर ले,उसकी इन हरकतों का उस पर कोई असर ना होगा,क्योंकि वे लोग दो-तीन दिन के मेहमान हैं फिर सब अपने अपने रास्ते। इसकी इन बातों का कोई गलत मतलब नहीं निकालना चाहिए और फिर शादी-ब्याह के घर में तो यह सब चलता ही है। नीरू दीदी की बारात आई,फेरे पड़े और विदा भी हो गई। सब कुछ ठीक-ठाक से निपट गया। कामिनी के पापा ने बुआ जी और फूफा जी से कहा,-“अब हम भी आज्ञा चाहते हैं। इजाजत दीजिए। बेटी राजी-खुशी विदा हो गई,इससे ज्यादा और क्या चाहिए। बुआ जी ने कहा-“हम तो नहीं कह रहे हैं कि जाओ, अगर तुम जाना ही चाहते हो,तो मैं रोकूंगी नहीं,क्योंकि बच्चों के स्कूल भी है।”
कामिनी की मम्मी ने भी कपड़े-लत्ते समेटे और सभी से विदा लेते हुए बुआ-फूफा जी के चरण स्पर्श करने लगे। मिलने-बिछड़ने के इस अवसर पर सबकी आँखें और हृदय द्रवित हो उठे। मम्मी-पापा का स्वभाव ही कुछ ऐसा था कि कोई अपने-आपको रोक न सका। हार्दिक का हाल भी कुछ ऐसा ही था। स्टेशन छोड़ने के लिए बड़े भैया,छोटे भैया के संग-संग हार्दिक भी हो लिये। सब अपनी-अपनी गुफ्तगू में व्यस्त थे। तभी मौका देखकर वह उसकी तरफ आया और कुछ धीमे स्वर में बोला,-“हमें याद रखोगी न…।“
उसने कभी उसकी बातों को गंभीरतापूर्वक नहीं लिया था,इसलिए ऐसा लगा कि शायद वह मसखरी कर रहा है। गाड़ी ने हॉर्न दिया और कुछ ही मिनटों में गाड़ी ने स्टेशन को दूर छोड़ दिया।
“दीदी,कामिनी बिटिया का टेलीफोन नम्बर हमारे पास है। यदि आप कहें तो उससे फोन पर ही…।”
“तुम ठीक कह रहे हो। नेक कामों में देरी नहीं करनी चाहिए,तुम मोहिता को तुरंत फोन लगाओ और बात कर लो।” कामिनी के मन की व्यथा कुछ विचित्र सी थी,जिसकी बातों को कभी मोल नहीं दिया,आज उसके हाथों में मेरे जीवन की डोर थमाने की बात सोची जा रही है। जिस तरह उसे वो बचकानी बातें बात याद हैं,क्या उसको भी…?
कामिनी अपने-आपसे प्रश्न करने लगी कि क्या वो उसे पसंद करेगा ? वह भी इस बात को जानकर खुश होगा ? क्या वो सब कुछ उसके लिए सचमुच कोई मजाक था ? या….।
पापा ने मोहिता दीदी को फोन लगाया और कुशल-मंगल के उपरांत पापा ने दीदी से हार्दिक के संदर्भ में पूछा,-“क्या कामिनी के लिए हार्दिक का रिश्ता उचित रहेगा ? लड़का-परिवार सब कुछ तुम्हारा देखा-भाला है। इस रिश्ते के लिए तुम आगे बात बढ़ाओगी क्या ? देखो रिश्ता जुड़ जाए तो बहुत बढ़िया होगा। अखिर कामिनी तुम्हारी ही छोटी बहन है। देखो अगर रिश्ता जुड़ जाए तो….।”
“हाँ! मामा जी आप ठीक कह रहे हैं। सब कुछ देखा-भाला है,लेकिन आपको हार्दिक के विषय में कैसे…?
“दीदी घर आई हुईं हैं बस बातों-बातों में…।”
“मामा जी आपने थोड़ी देर कर दी। अगर आपके मन में ऐसा कोई विचार था,एक बार बताना चाहिए था। दो दिन बाद ही रुपेश की सगाई है,भटिंडा के व्यापारी की बेटी से रिश्ता तय हुआ है। लड़की भी किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में उच्च पद पर…।”
पापा ने धीमे स्वर में,-“ठीक है।” कहते हुए फोन नीचे रख दिया।”

परिचय–पूजा हेमकुमार अलापुरिया का साहित्यिक उपनाम ‘हेमाक्ष’ हैl जन्म तिथि १२ अगस्त १९८० तथा जन्म स्थान दिल्ली हैl श्रीमती अलापुरिया का निवास नवी मुंबई के ऐरोली में हैl महाराष्ट्र राज्य के शहर मुंबई की वासी ‘हेमाक्ष’ ने हिंदी में स्नातकोत्तर सहित बी.एड.,एम.फिल (हिंदी) की शिक्षा प्राप्त की है,और पी.एच-डी. की शोधार्थी हैंI आपका कार्यक्षेत्र मुंबई स्थित निजी महाविद्यालय हैl रचना प्रकाशन के तहत आपके द्वारा आदिवासियों का आन्दोलन,किन्नर और संघर्षमयी जीवन….! तथा मानव जीवन पर गहराता ‘जल संकट’ आदि विषय पर लिखे गए लेख कई पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैंl हिंदी मासिक पत्रिका के स्तम्भ की परिचर्चा में भी आप विशेषज्ञ के रूप में सहभागिता कर चुकी हैंl आपकी प्रमुख कविताएं-`आज कुछ अजीब महसूस…!`,`दोस्ती की कोई सूरत नहीं होती…!`और `उड़ जाएगी चिड़िया`आदि को विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में स्थान मिला हैl यदि सम्म्मान देखें तो आपको निबन्ध प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार तथा महाराष्ट्र रामलीला उत्सव समिति द्वारा `श्रेष्ठ शिक्षिका` के लिए १६वा गोस्वामी संत तुलसीदासकृत रामचरित मानस पुरस्कार दिया गया हैl इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा में लेखन कार्य करके अपने मनोभावों,विचारों एवं बदलते परिवेश का चित्र पाठकों के सामने प्रस्तुत करना हैl