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काश

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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काश! मेरी माँ होती आज जिन्दा,
तो माँ की गोद में सोता ये बन्दाl

माँ बचपन की तरह ही दुलारती,
आँचल में बैठा के खाना खिलातीl

भले ही मैं बहुत खूबसरत नहीं,
मगर टीका लगाना भूलती नहींl

काश! फिर मुझे लल्ला कह पुकारती,
बालों में तेल लगा कंघे से संवारतीl

आज माँ की बिटिया भी बड़ी हो गयी है,
शादी के रंगीन सपनों में खो गयी हैl

काश! माँ होती तो बिटिया को सजाती,
बहुत ही चाव से इसकी शादी करवातीl

सब-कुछ सूना लगता है बिना माँ के,
अब क्या होगा इस तरह आँसू बहा केl

अब बिना माँ-बापू के ही रहना होगा,
उनसे बिछुड़ने का दर्द सहना ही होगाl

जो उत्तरदायित्व दिये हैं,उन्हें मैं निभाऊँगा,
अपनी बहना की शादी धूमधाम से कराऊँगाl

बहन-भाइयों को संस्कारित बनाऊँगा,
माँ-बापू का सर ऊँचा हो,इतना पढ़ाऊँगाl

काश!माँ एक बार ही आ जाती,
सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दे जातीll

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है।