ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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कैसी है ये जीवन की पहेली,
सब साथ में फिर भी अकेली।
दिल कहीं भी लगता नहीं,
भीड़ में भी होती हूँ अकेली।
न झूठ बोलूँ और न करूँ फ़रेब,
खाली नहीं रहती कभी जेब।
दिखावा भी हमें आता नहीं,
चापलूसी कभी सीखी नहीं।
जो हूँ, जैसी हूँ होता है नाज,
इसलिए मेरा कोई नहीं आज।
यूँ तो जीवन के हर मोड़ पर,
मेरे कई बनकर आए सहचर।
सादगी कभी आयी नहीं रास,
चालाकियाँ सीखी नहीं, काश!
हाय, हैलो और फिर तू-तड़ाक,
मैं कभी भी नहीं हुई बेबाक।
सब छूटे तो छूटे, चाहे जग रुठे,
पर कभी स्वाभिमान न टूटे।
जहां पर भी इज्जत नहीं,
वहाँ पर बने रहना नहीं।
दर्पण में अपना मुख देखना है,
मन मेरा तो दिल का आइना है।
सच के साथ इतना है विश्वास,
वो ईश्वर जो है हमारे साथ॥