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खिलखिलाती सुबह

शशि दीपक कपूर
मुंबई (महाराष्ट्र)
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आज सोचा था-
खिलखिलाती सुबह में,
कुछ हटकर करेंगे
कुछ काम,
उत्साह,उमंग व उल्लास के संग।

बीवी हर बात में नुक्स निकालती है,
और
बच्चे रहते हैं हमसे अब बे-चिंत।

खग का एक डाल से उड़,
दूरी डाल पर जा चुप जाना
बहुमंजिला इमारतों में,
अपने सुख-दु:ख के घोंसले बना लेना
कोई नई बात नहीं! आम बात है!
प्रकृति के रंगों में घुल मिल जाना,
कुछ नया खोजना
सबका निराला है रंग-ढंग।

मुझे इतने से ही परिवेश में,
कुछ नया करने का उत्स
ले घेरे बैठा है आज,
लेकिन,फिर भी
अपनी ज्ञानेंद्रियों के भंवर में,
बार-बार सोच रहा हूँ
चलो और कुछ न सही,
देखते है टी.वी.पर चित्रपट।

अब,
खिलखिलाती सुबह ढलने को हो गई
घर के कुछ काम कर दिए थे मैंने,
मिर्च मसाले पिसे देख
मेरी श्रीमती जी हो रहीं आज दंग,
मैं मन ही मन हो रहा था प्रसन्न
जैसे २५७ करोड़ की जायदाद पकड़ ली हो,
अपने कर में,
मिर्च-मसालों की जलन के संग॥

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