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गाँव और शहर की यादें

संजय जैन 
मुम्बई(महाराष्ट्र)

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कैसे भूलूँ मैं,बचपन अपना,
दिल दरिया और,समुंदर जैसा।
याद जब भी आये वो पुरानी,
दिल खिल जाता है बस मेराl
और अतीत में खो जाता हूँl
कैसे भूलूँ मैं,बचपन अपनाll

क्या कहूँ उस,स्वर्ण काल को,
जहां सब अपने,बनकर रहते थे।
दु:ख मुझे हो तो,रोते वो सब थे,
मेरी पीड़ा को,वो समझते थे।
इस युग को ही,स्वर्णयुग कह सकते हैंll

मेरा रहना,खाना,और पीना,
खुद के माँ-बाप को,कुछ था न पता।
ये सब तो,पड़ोसी कर देते थे,
इतनी आत्मीयता,होती थी उनमें।
जिससे गाँव में,रिश्ते चला करते थेll

अब जवानी का,दौर कुछ अलग है,
शहरों में कहां,आत्मीयता होती है।
सारे के सारे,लोग स्वार्थी हैं यहाँ के,
सिर्फ मतलब के,लिए ही मिलते हैं।
मतलब निकलते ही,
मिलने पर नजर चुरा लेते हैंll

पत्थरों के शहर में रहते-रहते,
खुद पत्थर दिल,वो हो गए हैं।
किस-किसको दें,दोष हम इसका,
सारे ही एक जैसे जो हैंll

ये ही अन्तर है,गाँव और शहर में,
अपने और पराए में।
वहां सब अपने होते थे,
यहां कोई किसी का,नहीं होताll

यहां के सारे रिश्ते झूठे हैं,
इसलिए अपना बनकर
अपनों को ही ठगते हैंl
और इंसानियत की तो,
अब न करो बातl
क्योंकि,अपने बनाकर,
अपनों को ही,लूटा करते हैंll

कैसे भूल जाऊं,मैं बचपन अपना,
जहां सब,एकसाथ रहते थेll

परिचय-संजय जैन बीना (जिला सागर, मध्यप्रदेश) के रहने वाले हैं। वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। आपकी जन्म तारीख १९ नवम्बर १९६५ और जन्मस्थल भी बीना ही है। करीब २५ साल से बम्बई में निजी संस्थान में व्यवसायिक प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। आपकी शिक्षा वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ ही निर्यात प्रबंधन की भी शैक्षणिक योग्यता है। संजय जैन को बचपन से ही लिखना-पढ़ने का बहुत शौक था,इसलिए लेखन में सक्रिय हैं। आपकी रचनाएं बहुत सारे अखबारों-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। अपनी लेखनी का कमाल कई मंचों पर भी दिखाने के करण कई सामाजिक संस्थाओं द्वारा इनको सम्मानित किया जा चुका है। मुम्बई के एक प्रसिद्ध अखबार में ब्लॉग भी लिखते हैं। लिखने के शौक के कारण आप सामाजिक गतिविधियों और संस्थाओं में भी हमेशा सक्रिय हैं। लिखने का उद्देश्य मन का शौक और हिंदी को प्रचारित करना है।