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गुण और गुनाह दोनों की ही कीमत

डॉ. प्रताप मोहन ‘भारतीय’
सोलन (हिमाचल प्रदेश)
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संतरंगी दुनिया-२०…


        यदि आप अपनी पत्नी को खुश रखना चाहते हैं तो अपने पर्स का मुँह खुला रखें और अपना मुँह बंद रखें। वक़्त बदल गया है, पहले लड़कियाँ सफेद घोड़े पर राजकु‌मार की कल्पना किया करती थी, आजकल बीएमडब्ल्यू में गधा भी आ जाए तो चलता है। ‘दुनिया में सिर्फ एक दिल ही है, जो बिना रूके काम करता है; इसलिए दिल को खुश रखो, वो आपका हो या पराया।’
  कोई इंसान अगर आपको केवल जरूरत पड़‌ने पर याद करता है, तो उस बात का बुरा मत मानिए, क्योंकि जब अंधेरा हो जाता है, तभी दीए की याद आती है।
      डाकू और नेता दोनों ही डाका डालते हैं, पर देखिए- डाकू को ‘कारावास’ मिलता है और नेता को ‘कार-आवास’ !! ‘हमारे देश में लॉजिक कोई नहीं मानता, सबको मैजिक चाहिए, इसलिए यहाँ साइंटिस्ट के बजाय बाबा फेमस है।
   मैं नास्तिक हूँ, क्योंकि मैंने धर्म की आड़ में धंधे देखे हैं; ईश्वर नहीं। हमारे देश में फिल्में टैक्स फ्री हो जाती है, क्योंकि वो करोड़पति लोगों का व्यापार है; परन्तु शाला के बच्चों की फीस माफ नहीं हो सकती, क्योंकि वो गरीब बच्चों के भविष्य की बात है। आदमी के गुण और गुनाह दोनों की ही कीमत होती है। फर्क इतना है, कि गुण की कीमत मिलती है, और गुनाह की कीमत चुकानी पड़‌ती है। ‘कुदरत की करामात देखिए, जिंदा आदमी पानी में डूब जाता है और मुर्दा तैर कर दिखाता है।’
    पैरों में आई हुई मोच और आदमी की गिरी हुई सोच इंसान को कभी आगे बढ़ने नहीं देती है। टूटी हुई चीज हमेशा परेशान करती है, जैसे-दिल, नींद, भरोसा और सबसे ज्यादा किसी से उम्मीद। अक्सर लोग कहते हैं कि बीती बात भुला दो-लेकिन उन बातों से हमारे ऊपर क्या बीती है, वो ये पूछना भूल जाते हैं। हमेशा अच्छे लोगों की संगत में रहिए, क्योंकि सुनार का कचरा भी बादाम से महंगा होता है। ‘अजीब है दुनिया, अफवाह धीरे से भी बोलो तो पूरी दुनिया में फैल जाती है और सच को चिल्लाकर भी बोलो तो दुनिया यकीन नहीं करती है।’
      जब तालाब भरता है तब मछलियाँ चींटियों को खाती हैं, और जब तालाब सूख जाता है तब चीटियाँ मछलियों को खाती हैं। इस दुनिया में मौका सबको मिलता है, बस अपनी बारी का इंतजार कीजिए।              
  सुनी हुई बातों पर भरोसा नहीं करें, क्योंकि कोई भी व्यक्ति आपको कहानी का वो भाग नहीं बताएगा, जहां वह स्वयं गलत था। रिस्क हमेशा बड़ी लेनी चाहिए, अगर जीत गए तो तुम खुश और हार गए तो पड़ोसी खुश। ‘शुगर का डर लोगों में इतना बढ़ गया है, कि लोगों ने मीठा खाना ही नहीं; बल्कि मीठा बोलना भी बंद कर दिया है।’ दुनिया मतलब की है, इस दुनिया में कोई किसी का हमदर्द नहीं होता। लाश को श्मशान में रखकर अपने ही लोग पूछते हैं और कितना वक़्त लगेगा ?
धर्म की दीवार ऊँची होती जा रही है और इंसानियत उसके नीचे दबती जा रही है। ‘आजकल भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा, मैंने गर्लफ्रेंड की जासूसी करने के लिए एक दोस्त को उसका नम्बर दिया था- आज उन दोनों की शादी का कार्ड आया है।’ एक व्यक्ति भगवान से रोज शिकायत करता था- हे भगवान, ठंड बहुत पड़ रही है, गर्मी कितनी है, बारिश नहीं हो रही है, दुकान में ग्राहक नहीं आ रहे हैं, बाजार बहुत मंदा है। बीबी झगड़ालू है और बच्चे हाथ से निकल गए हैं। तो भगवान बोले- भाई यदि तेरे को नीचे मजा नहीं आ रहा है तो ऊपर आजा, मैं यमराज को भेज रहा हूँ। यह सुनते ही वह व्यक्ति बोलने लगा- नहीं नहीं प्रभु, यहाँ सब ठीक है। मैं तो मजाक कर रहा था।
   शिक्षक ने छात्र से पूछा- संस्कृत भाषा में ‘पत्नी’ को क्या कहते हैं ? छात्र ने बड़ा प्यारा उत्तर दिया- गुरु जी संस्कृत तो छोड़िए, किसी भी भाषा में पत्नी को कुछ नहीं कह सकते हैं। ‘खिलाड़ी तो हम आपसे अच्छे हैं, लेकिन भरोसे और रिश्ते में खेलना हमारे संस्कारों में नहीं है।’
    इस दुनिया में हर कोई है परेशान, कोई सच में है परेशान, तो कोई सच से है परेशान।

परिचय-डॉ. प्रताप मोहन का लेखन जगत में ‘भारतीय’ नाम है। १५ जून १९६२ को कटनी (म.प्र.)में अवतरित हुए डॉ. मोहन का वर्तमान में जिला सोलन स्थित चक्का रोड, बद्दी (हि.प्र.)में बसेरा है। आपका स्थाई पता स्थाई पता हिमाचल प्रदेश ही है। सिंधी,हिंदी एवं अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले डॉ. मोहन ने बीएससी सहित आर.एम.पी.,एन. डी.,बी.ई.एम.एस., एम.ए., एल.एल.बी.,सी. एच.आर.,सी.ए.एफ.ई. तथा एम.पी.ए. की शिक्षा भी प्राप्त की है। कार्य क्षेत्र में दवा व्यवसायी ‘भारतीय’ सामाजिक गतिविधि में सिंधी भाषा-आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति का प्रचार करने सहित थैलेसीमिया बीमारी के प्रति समाज में जागृति फैलाते हैं। इनकी लेखन विधा-क्षणिका, व्यंग्य लेख एवं ग़ज़ल है। कई राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन जारी है। ‘उजाले की ओर’ व्यंग्य संग्रह प्रकाशित है। आपको राजस्थान से ‘काव्य कलपज्ञ’,उ.प्र. द्वारा ‘हिन्दी भूषण श्री’ की उपाधि एवं हि.प्र. से ‘सुमेधा श्री २०१९’ सम्मान दिया गया है। विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय अध्यक्ष (सिंधुडी संस्था)होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य का सृजन करना है। इनके लिए पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद एवं प्रेरणापुंज-प्रो. सत्यनारायण अग्रवाल हैं। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी को राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिले,हमें ऐसा प्रयास करना चाहिए। नई पीढ़ी को हम हिंदी भाषा का ज्ञान दें, ताकि हिंदी भाषा का समुचित विकास हो सके |