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गुल खिला होता

ममता तिवारी ‘ममता’
जांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)
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विधाता छँद आधारित….

दरिया प्यार का बहता सुकूँ का गुल खिला होता,
बवाली जात आदम, काश! अमन से तू भरा होता।

मुरव्वत से अगर रहते कज़ा हँसती हुई आती,
शिकश्ता ज़िंदगानी का ये रंजो-गम धुँआ होता।

ग़ज़ल खुशियों भरी कहते तराने साथ मिल गाते,
खुशी का सिलसिला होता हरिक दिल झूमता होता।

ये पसरा खौफ़ का आलम बशर सहमा हुआ-सा है,
यक़ी गर हर तरफ होता, न फिर कोई खता होता।

फरिश्ते भी किया करते जमीं शिरकत ख़ुशी ले कर,
ये दुनिया में जरा इंसानियत- सा कुछ बचा होता।

दुआ की धूप बारिश रौशनी की रात में होती,
निकलना घर से बेटी की अकेली, ना सज़ा होता।

बचे दुश्मन नहीं होते, अभी तक मुल्क के जिंदा,
तकल्लुफ़ का अगर मसला नहीं अपना हुआ होता॥
(इक दृष्टि इधर भी:
मुरव्वत=लिहाज, दिखावा=
तकल्लुफ़, शिरकत= सहभागिता, सहयोग,

जहालत=अशिक्षा, कज़ा= मौत, शिकस्त-हार, रंज-ओ-गम=दुःखी निराशा, बशर= मानव)

परिचय–ममता तिवारी का जन्म १अक्टूबर १९६८ को हुआ है। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्थित बी.डी. महन्त उपनगर (जिला जांजगीर-चाम्पा)में निवासरत हैं। हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाली श्रीमती तिवारी एम.ए. तक शिक्षित होकर समाज में जिलाध्यक्ष हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य(कविता ,छंद,ग़ज़ल) है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं। पुरस्कार की बात की जाए तो प्रांतीय समाज सम्मेलन में सम्मान,ऑनलाइन स्पर्धाओं में प्रशस्ति-पत्र आदि हासिल किए हैं। ममता तिवारी की लेखनी का उद्देश्य अपने समय का सदुपयोग और लेखन शौक को पूरा करना है।