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चलो चलें हम ढूंढ लें उनको फिर से

संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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सिखाने की हर विधा के माहिर,
कला, विशिष्टता उनमें हो जाहिर
शिष्ट-प्रतिभा जगाने में गुर माहिर,
फिर पढ़-लिख हम बनते शातिर।

स्लेट-पेंसिल हाथ सजाते,
वर्ण-शब्द के बोल बताते
मुर्द्धा-तालू गिनती सारी हमें रटाते,
हर्स्व-दीर्घ का बोध कराते।

भाव अर्थ, शब्द वाक्य का सृजन कराते,
मार-पीट कर सभी पहाड़े हमें रटाते
संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण सबके सारे भेद बताते,
शब्द भेद और वाक्य बनाना वही सिखाते।

सब बच्चों पर मेहनत करते,
सबको साथ-साथ समझाते
जोड़-घटाव, संख्या बोध अंक गणित से बीज गणित तक सब फार्मूले बड़े रटाते
न कभी धर्म-जाति का बोध कराते।

बड़े प्यार से हमें पढ़ाते,
कई विषय वो साथ पढ़ाते
कभी रुलाते-कभी हँसाते,
शब्द बाण से टीस दिलाते।

सच्चे-अच्छे, ठोंक-ठाक कर प्रतिभा में वो चाँद लगाते,
नाटक, गायन, व्यायाम, खेल, भाषण, कविता, लेख निबंध में कई दिनों तक प्रतियोगी का भाव जगाते
वर्ष में एक दिन सिर्फ ‘शिक्षक दिवस’ पर खुशी-प्यार से खूब इठलाते,
हम सारे बच्चे अपने घर से बड़े-बड़े उपहार थे लाते।

हर बच्चे के हर उपहार पर मेरे शिक्षक को बड़ी खुशी के आँसू आते,
काश! वो भाव उसी वक्त हम, थोड़ा-थोड़ा समझ तो पाते
मेरी उम्र अब छठे दशक पर, काश! वो शिक्षक फिर मिल जाते,
बड़ा मनाते, बड़ा खिलाते अब तो आँखें साथ मिलाते, उनकी शैक्षणिक तपस्या का हम अश्रु धार से चरण नहाते।

शिक्षक-शिष्य की परम विधा का हम भी कुछ तो भान कराते,
५ सितम्बर जब-जब आता, हर एक शिक्षक बहुत याद हमें हैं आते।
चलो चलें हम ढूंढ लें उनको फिर से अपना फर्ज़ निभाते,
शिक्षक के उस त्याग से मिला हमें है ज्ञान, दिवस बताता आज उनसे है अभिमान, चरण स्पर्श-प्रणाम कर खुदगर्जी का बोझ हटाते॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएससी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता, रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुंबई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़ें हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में आपको
महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२० २३ सहित अन्य सम्मान हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले संजय सिंह ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज- पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”