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चाँदनी का मौन निमंत्रण

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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अमृत की रात (शरद पूर्णिमा विशेष)….

शरद की रात है,
आकाश ने आज अपनी सारी निर्मलता
चंद्रमा के चेहरे पर रख दी है।

धरती के आँगन में दूधिया उजास उतर आया है, 
पेड़ों की पत्तियाँ चुप हैं
हवा के पास भी आज कहने को बहुत कुछ है।

पूर्ण चंद्रमा को देखकर मन में एक प्रश्न उठता है,
क्या सचमुच पूर्ण होना इतना सुंदर होता है
या अपनी अपूर्णताओं के साथ 
जीना सीख लेना ही पूर्णता का दूसरा नाम है ?

आज चाँदनी मेरी खिड़की से भीतर आई है,
मेरे मन के उन कोनों तक 
जहाँ कुछ पुरानी इच्छाएँ अब भी, चुपचाप बैठी हैं।

कुछ सपने जिन्हें समय की कमी ने रोक दिया, 
कुछ शब्द जो संबंधों की मर्यादा में
कभी कहे ही नहीं गए
कुछ आँसू, जिन्हें मुस्कान के पीछे छिपाकर,
मैंने जीवन आगे बढ़ाया
आज की रात वे सब मेरे पास लौट आए हैं।

शरद की चाँदनी केवल आकाश को नहीं सँवारती,
वह मनुष्य के भीतर भी कुछ खोजती है।

देखना चाहती है कि इतने उजालों, के बीच हमारे भीतर कितनी जगह अब भी अँधेरे के लिए बची है
कितने घरों में रिश्तों के बीच दीवारें खड़ी हैं,
कितनी आँखें अपनों के होते हुए भी उदास हैं
कितने चेहरे अपनी पीड़ा को हँसी में बदलकर,
दुनिया के सामने खड़े हैं।

काश!, चाँदनी उन सब तक पहुँच सके,
उस माँ तक, जो बच्चों की थकान समझती है
पर अपनी थकान का नाम नहीं लेती।

उस पिता तक, जो अपनी चिंताओं को परिवार की जरूरतों के नीचे दबाकर,
हर सुबह फिर काम पर निकल जाता है
उस स्त्री तक, जिसने सबको सँभालते हुए,
अपने ही मन का हाथ छोड़ दिया है
उस बच्चे तक, जिसकी आँखों में सपने तो हैं,
पर उन्हें पूरा करने के साधन नहीं।

आज की रात सबके हिस्से में थोड़ा उजाला आए,
सिर्फ आँगन में नहीं…
उनके जीवन में भी जहाँ,
उम्मीद बहुत दिनों से दरवाजे पर खड़ी है।

मुझे अच्छा लगता है शरद पूर्णिमा का यह उत्सव, 
जब घरों में खीर बनती है
परिवार एकसाथ बैठता है,
पुरानी परंपराएँ नई पीढ़ी की स्मृतियों में
अपना स्थान बनाती हैं।

पर मैं चाहती हूँ कि इस रात की मिठास,
हमारे व्यवहार में भी घुले
हमारी वाणी में थोड़ी कोमलता आए, 
हमारे निर्णयों में दूसरों के लिए थोड़ी जगह बने।

आस्था का अर्थ केवल हाथ जोड़ना नहीं,
किसी दुखी मन के पास बिना प्रश्न किए बैठ जाना भी है।

प्रार्थना का अर्थ केवल अपने लिए माँगना नहीं,
किसी अनजान की पीड़ा देखकर
मन का बेचैन हो उठना भी है।

और उजाला केवल वह नहीं,
जो चंद्रमा से धरती पर उतरता है
उजाला वह भी है जो मनुष्य के भीतर,
जागकर दूसरे मनुष्य तक पहुँचता है।

आज मैं चाँद से कोई असाधारण वरदान नहीं माँगती,
बस इतनी-सी इच्छा है कि मन में संवेदना बनी रहे
रिश्तों में संवाद जीवित रहे,
और किसी की पीड़ा को उसकी कमजोरी समझने की भूल हमसे न हो।

शरद पूर्णिमा की रात हर वर्ष लौटकर आती है,
चाँद फिर पूरा होता है
चाँदनी फिर धरती पर बिछती है
लेकिन इस बार जब सुबह हो,
तो कुछ उजाला हमारे भीतर भी बचा रहे।

हम किसी के जीवन में सहारा बन सकें,
किसी की चुप्पी सुन सकें,
किसी के संघर्ष का सम्मान कर सकें॥