डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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बुजुर्गों से घरों की शोभा, उनसे घर का मान रहे,
उनके अनुभव के दीपों से, रोशन हर इंसान रहे
नई पीढ़ियाँ भूल न जाएँ, जड़ों से जुड़ने का अर्थ,
बड़ों का सम्मान जहाँ हो, वहाँ संस्कार महान रहें।
जीते-जी दो रोटियाँ कम, पर दो मीठे बोल उन्हें,
मत बाँटो घर की संपद, बाँटो प्रेम अनमोल उन्हें
मरने पर तस्वीर सजाकर, आँसू बहाना है व्यर्थ,
मान दो तुम आज बुजुर्गों, बाद न देना मोल उन्हें।
मोबाइल में जग भर अपना, घरों में बुजुर्ग पराये,
जिनकी उँगली पकड़ चले थे, उनको ही आज भुलाये
स्क्रीनों पर संवेदनाएँ, व्यवहारों में शून्यता,
कैसे नई सभ्यता के दीपक अँधेरों को मिटायें ?
जिन कंधों पर चढ़कर बचपन, ऊँचे सपने देखे थे,
जिनकी छाँव तले जीवन के संकट सारे झेले थे
आज वही माँ-बाप अकेले, द्वार-द्वार क्यों भटक रहे?
किस विकास पर गर्व करें हम, जब अपने ही रूठे थे ?
बड़ों का जब मान बचाएँ, तभी घर स्वर्ग समान बने,
सेवा, श्रद्धा, प्रेम से हर घर आँगन तीर्थधाम बने।
धन-दौलत से बढ़कर होता, आशीषों का अमृत-धन,
बुजुर्गों के सम्मान से ही, परिवारिक अभिमान बने॥
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥