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चान्डाल चौकड़ी की पिकनिक

डॉ.आभा माथुर
उन्नाव(उत्तर प्रदेश)
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विश्व बाल दिवस स्पर्धा विशेष………..


टिंकू मेंढक,पिंकी गिलहरी,टफी कछुए और गोलू पिल्ले की टोली जंगल में चांडाल चौकड़ी के नाम से प्रसिद्ध थी। जमीन पर,पानी में और पेड़ों पर भी इनके उपद्रव का अंत न था। पेड़ के नीचे से निकलने वालों पर फल या फलों की गुठलियाँ गिराना,नदी के पास से निकलने वालों पर पानी उछालना,और पास से आने-जाने वाले लोगों को डरा कर या लालच दिखा कर गलत रास्ते पर पहुँचा देना उनके प्रिय खेल थे। पानी में टफ़ी कछुए और टिंकू मेढक की नेतागीरी में,ज़मीन पर गोलू पिल्ले की नेतागीरी में और पेड़ों पर पिंकी गिलहरी के नेतृत्व में चांडाल चौकड़ी की गतिविधियाँ जारी रहती थी।
गोलू पिल्ला इस टीम का सबसे लोकप्रिय सदस्य था। छोटे से क़द,बर्फ़ीले सफ़ेद रंग,लगभग गुलाबी आँखों और लम्बे फ़रदार बालों ने उसे अत्यन्त रूपवान बना दिया था। रूपवान होने के साथ-साथ वह बहुत बुद्धिमान भी था। इन कारणों से वह थोड़ा घमण्डी भी हो गया था
इन दिनों विद्यालय में गर्मी की छुट्टियां चल रहीं थीं। इसलिये चांडाल चौकड़ी के नये-नये प्रोग्राम बना करते थे। एक दिन टिंकू मेंढक ने बताया कि नदी के दूसरी ओर तरबूज़ का खेत है। यह सुनकर सब मित्रों ने झटपट पिकनिक का प्रोग्राम बना डाला।तय हुआ कि नदी पार करने के लिये गोलू पिल्ला,टफ़ी कछुए की पीठ पर सवार होगा और पिंकी गिलहरी टिंकू मेंढक की पीठ पर सवारी करेगी।
अगले दिन निश्चित समय पर सभी मित्र नदी के किनारे एकत्र हो गये। पहले गोलू पिल्ला कूद कर पानी में तैर रहे टफ़ी कछुए की पीठ पर सवार हो गया,फिर पिंकी गिलहरी टिंकू मेंढक की पीठ पर सवार हो गई। थोड़ी-सी उछल-कूद के बाद जलयात्रा आरंभ हो गई। ज़रा-सी देर में वे नदी के दूसरे किनारे पर जा पहुंचे। बस फिर क्या था घुस गए तरबूज के खेत में और शुरू हो गई पेट पूजा। पिंकी गिलहरी मस्ती में खा रही थी और पूछ हिलाती जा रही थी। “ए पिंकी तमीज से खाओ अपनी पूछ मेरे मत लगाओ”-टिंकू मेंढक बोला।
“मैं कोई जान-बूझकर पूछ थोड़ी मार रही हूँ। जब मैं खाती हूँ तो मेरी पूँछ खुद ही हिलने लगती है। तुम्हें बुरा लगता है तो तुम ही दूर क्यों नहीं हट जाते ? बड़े आये तमीज सिखाने वाले।”-पिंकी ने अकड़ कर उत्तर दिया।
अब टिंकू को भी ग़ुस्सा आ गया-“अपनी ग़लती तो मानती नहीं,ऊपर से रुआब दिखाती है। मेरी मम्मी ठीक कहती हैं कि पूँछ वाले
जानवरों से दोस्ती नहीं करनी चाहिए।”
“ए टिंकू,तुझे पिंकी से लड़ना है तो लड़,मगर सभी पूँछ वाले जानवरों को गाली मत दे।”
इस बार गोलू पिल्ला बीच में कूद पड़ा।” तुझसे क्या मतलब ? तू बीच में क्यों बोला ?” टिंकू ने अकेले ही गोलू और पिंकी दोनों से एकसाथ मोर्चा लेने की ठानी।
“मतलब है। मेरे पास भी पूँछ है।” गोलू ने जवाब दिया।
पिंकी ने बात आगे बढ़ाई।-“गोलू तुम ठीक कहते हो,यह बिना पूंछ वाले जानवर हम पूंछ वालों से जलते हैं।”
“ओम् शान्ति,शान्ति,शान्ति,अरे अब लड़ना छोड़ कर तरबूजों का स्वाद लो,वरना थोड़ी देर में धूप चढ़ आएगी। उससे पहले घर भी लौटना है।” टफ़ी कछुए ने संधि प्रस्ताव रखा। उसके बीच-बचाव से तृतीय विश्व युद्ध होते-होते बचा।
अब शुरु हुई जमकर पेट पूजा। थोड़ी देर बाद ही सबका पेट भर गया। अचानक आकाश में काले-काले बादल घिर आये और
देखते ही देखते मोटी-मोटी बूँदे पड़ने लगीं। चारों मित्र घबरा गये और एक पेड़ के नीचे खड़े हो कर वर्षा समाप्त होने की प्रतीक्षा करने लगे, परन्तु वर्षा का वेग तो बढ़ता ही जा रहा था। थोड़ी देर में ओले भी पड़ने लगे। पिंकी गिलहरी सबसे अधिक घबरा रही थी। उसने इससे पहले कभी ओले नहीं देखे थे। गोलू पिल्ला सबको ढांढस बना रहा था तो भी पिंकी गिलहरी घबराहट के कारण रोने लगी। वह रोते-रोते बोली-“देखो गोलू,भगवान हमारी शैतानी के कारण हमें मार रहे हैं। भगवान हमें पत्थरों से मार रहे हैं। हमने तरबूज का खेत उजाड़ दिया न,इसीलिए।”
“हट पगली,वह तो बर्फ के टुकड़े हैंl कभी-कभी वर्षा के साथ ओले भी गिरते हैंl तू मेरे नीचे छुप जाl” कहकर गोलू बैठ गया और पिंकी उसके नीचे छुप गई। इससे उसको बड़ा आराम मिलाl सर्दी लगना भी कम हो गई और सुरक्षा की भी अनुभूति हुई। काफी देर बाद वर्षा कम हुई। तब तक तिपहरिया हो गई थी और शाम होने में थोड़ी देर रह गई थी। तभी आकाश में सात रंगों की पट्टियाँ-सी बन गयीं। पिंकी गिलहरी और टिंकू मेंढक आश्चर्य से बोले-“गोलू वह क्या है ?”
इस बार गोलू को भी भारी आश्चर्य हुआ,परन्तु उसने बड़ी शान्ति पूर्वक कहा-“शायद भगवान ड्राइंग बना रहे हैं।”
“सुनो मैं बताता हूँ। मैं तुम सबसे आयु में भी बड़ा हूँ।” टफ़ी कछुए ने कहाl “उसे कहते हैं इन्द्रधनुष। अब आगे कुछ मत पूछनाl” इससे आगे टफ़ी को स्वयं कुछ नहीं मालूम था। अब घर लौटने का समय था।
लौटते समय सब इतना थके हुए थे कि किसी को पीठ पर बिठा कर लाने की शक्ति कछुए या मेंढक में नहीं थी। टिंकू मेंढक ने एक बढ़िया आईडिया सुझाया-“चलो नाव पर चलते हैं।”
“पर यहां तो कोई नाव दिखाई नहीं दे रहीl” सबने आश्चर्य से कहा। टिंकू मेंढक तुरंत तरबूज का एक खाली छिलका उठा लाया। छिलके के गूदे को कुतर-कुतर कर नाव को खूब गहरा कर लिया गया। फिर चारों मित्र उसमें बैठे। पतवार के लिये पेड़ की दो टहनियाँ ले ली गई, परंतु पतवार की आवश्यकता नहीं पड़ी,क्योंकि नाव हवा की दिशा में बह रही थी। तभी न जाने कैसे नाव में नीचे से छेद हो गया और पानी अंदर आने लगा। कछुआ बोला-“मैं बाहर कूद जाता हूँ,कम-से-कम कुछ वजन तो कम होगा।” यह कहकर कछुआ बाहर कूद गया।
“मैं भी बाहर कूदता हूँ,मुझे भी तैरना आता हैl” टिंकू मेंढक ने कहाl “नहीं तू नाव में ही रह और पानी उलीच।”-गोलू ने कहाl “पिंकी बेचारी अकेली कितना पानी उलीचेगी ?मुझे तो पतवार चलानी है।” इस तरह गोलू ने पतवार संभाली और टिंकू मेढक व पिंकी गिलहरी नाव में बैठे दोनों हाथों से पानी उलीचते रहे। तभी टफी कछुए ने नाव के नीचे जाकर छेद की जगह अपनी पीठ लगा दीl इस तरह नाव में पानी घुस ना लगभग बंद हो गयाl गोलू पिल्ला पतवार चला रहा थाl शीघ्र ही नाव किनारे पर आ लगीl नाव में सवार तीनों मित्र किनारे पर कूद पड़ेl टफी ने नारा लगाया-“जान बची और लाखों पाएl” पीछे-पीछे शेष तीनों ने कहा-“लौट के चारों घर को आए।” इस अविस्मरणीय पिकनिक ने चारों की दोस्ती के रंग को और भी गहरा कर दिया।

परिचय–डॉ.आभा माथुर की जन्म तारीख १५ अगस्त १९४७ तथा जन्म स्थान बिजनौर (उत्तर प्रदेश)हैl आपका निवास उन्नाव स्थित गाँधी नगर में हैl उन्नाव  निवासी डॉ.माथुर की लेखन विधा-कविता,बाल कविताएं,लेख,बाल कहानियाँ, संस्मरण, लघुकथाएं है। सामाजिक रुप से कई संगठनों से जुड़कर आप सक्रिय हैं। आपकी पूर्ण शिक्षा फिलासाफी ऑफ डॉक्टरेट है। कार्यक्षेत्र उत्तर प्रदेश है। सरकारी नौकरी से आप प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारी पद से सेवानिवृत्त हुई हैं। साझा संग्रह में डॉ.माथुर की कई रचनाएं प्रकाशित हो चुकी हैं। साथ ही अनेक रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हैं। सामाजिक मीडिया समूहों की स्पर्धाओं में आप सम्मानित हो चुकी हैं। इनकी विशेष उपलब्धि आँग्ल भाषा में भी लेखन करना है। आपकी लेखनी का उद्देश्य आत्म सन्तुष्टि एवं सामाजिक विसंगतियों को सामने लाना है, जिससे उनका निराकरण हो सके। आपमें दिए गए विषय पर एक घन्टे के अन्दर कविता लिखने की क्षमता है। अंग्रेज़ी भाषा में भी लिखती हैं।

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