Visitors Views 25

जनभाषा के संघर्ष को समर्थन देना होगा

जनभाषा में न्याय…

◾डाॅ. करुणाशंकर उपाध्याय (मुंबई, महाराष्ट्र )

हिंदी और भारतीय भाषाओं में न्याय की मांग मनुष्यता का तकाजा है। इस देश में ८२ फीसदी लोग हिंदी और ९८ फीसदी से अधिक लोग भारतीय भाषाओं का प्रयोग करते हैं। यदि हमारे सभी उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय हिंदी और भारतीय भाषाओं में बहस की अनुमति तथा निर्णय नहीं देते हैं तो यह देश के ९८ फीसदी<br>लोगों के मानवाधिकार का उल्लंघन है। यह संविधान की मूल भावना के भी विरुद्ध है।हमें न्याय के प्रश्न को मानवाधिकार से जोड़ना होगा, तभी हमारे न्यायमूर्ति इसको गंभीरता से लेंगे। अब जब भारत सरकार का रवैया अनुकूल है तो यह हम भारतीयों के समक्ष एक सुनहरा अवसर है। हमें एकजुट होकर जनभाषा के संघर्ष को समर्थन देना होगा और न्याय का दरवाजा हिंदी और भारतीय भाषाओं के लिए खुलवाना होगा।ऐसा करके ही हम उन जिम्मेदारियों का सम्यक निर्वाह कर सकते हैं, जिसे इतिहास ने हमें सौंपा है। यदि हम समवेत स्वर में आजादी के अमृत महोत्सव वर्ष में भारत सरकार से मांग करें कि, हिंदी और भारतीय भाषाओं में न्याय पाना हर भारतीय नागरिक का स्वाभाविक अधिकार है तो आजादी का अमृत महोत्सव वर्ष सार्थक हो जाएगा।
लोकतंत्र, राजभाषा और न्याय की भाषा-

◾नवीन कौशिक (हरियाणा)

भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जिसमें सभी कार्य जनता के हितों को ध्यान में रखकर किए जाते हैं और बहुमत से सभी निर्णय लिए जाते हैं, परंतु दुर्भाग्य से भारत की प्रशासकीय व राजकीय कार्यों की भाषा के विषय में जनता की भाषा का प्रयोग करने के स्थान पर एक फिरंगी भाषा को भारतीयों पर पिछले ७५ वर्षों से थोप रखा है, जिसे किसी भी मापदंड से उचित नहीं कहा जा सकता। यह न केवल भारत के नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है, यह मानव अधिकार का भी हनन है। और इसके साथ साथ यह एक तानाशाही कार्य है, जिसे लोकतांत्रिक कतई नहीं कहा जा सकता |भारत को सच्चे अर्थों में आजाद व लोकतंत्र कब माना जाएगा, जब भारत के न्याय तंत्र और प्रशासन की भाषा के रूप में भारतीय भाषाएं पूरी तरह से लागू हो जाएंगी और सभी न्यायिक व प्रशासकीय कार्य के भारतीय भाषाओं में होने लगेंगे।

ऐसी क्या मजबूरी है ?

◼ उत्कर्ष अग्रवाल

बचपन से हर जगह अंग्रेजी को ही देखा है। जाहिर है हमसे पहले वालों ने ही किया होगा। हम तो इसी में पढ़े-बढ़ें हैं, कोई ओर रास्ता भी नहीं। ऐसा क्यों है, किसने किया पता नहीं। अंग्रेज तो १९४७ में ही चले गए थे। कोर्ट में मातृभाषा चले या राजभाषा चले, यह सवाल नहीं है। सवाल तो यह है कि किसी दूसरे देश की भाषा जिसे कुछ अंग्रेजी जानने वालों के सिवाए कोई नहीं जानता, उसमें सब क्यों होता है। हमारी तो मजबूरी है कि जिस भाषा में सब चलता है, उसे सीखें। आजादी के ७५ साल बाद भी भारत और भारतवासी इतने मजबूर क्यों हैं। इन्हें इतना मजबूर किसने बनाया ? अब भी बदलाव न आए, ऐसी क्या मजबूरी है ?

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई)