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जब भी श्वाँसें भरता हूँ

संदीप धीमान 
चमोली (उत्तराखंड)
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बांधा जबसे है तुझको
एहसासों के उर बंधन में,
जब भी श्वाँसें भरता हूँ
हूँ उपवन जर चंदन में।

महकी-महकी भोर मेरी
महकी-सी ढली सांझ है,
संग-संग तारों अब्र-सा मैं
विचरण को स्कंदन में।

मुख आवरण गुमसुम-सा,
भीतर से हर्षित उर मेरा,
मानो हूँ चौखट मंदिर की
तरु प्रेम के वंदन में।

हूँ अधीर,व्याकुल उर से
नन्दन-सा उर उपवन में,
भांति-भांति के रंग बिखरे
बंधा जबसे संग बंधन में।

सप्तपदी की सत्य गामिनि
सत्य-सा भर कर तुमको,
महक रहा मधुर बेला सा
बंध तुम संग उर बंधन में।

जब भी श्वाँसें भरता हूँ,
हूँ उपवन जर चंदन में…॥