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जीवन का मेला

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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धमाचौकड़ी जीवन पथ पर,
चहुँ दिक मृगतृष्णा मेला है
भागमभागी चाह कश्मकश,
फॅंस मानव जग अलबेला है।

     सत्ता पद आसन राह जटिल, 
     लालच पथ ठेलम-ठेला है
     छल प्रपंच मिथ्या खल कामुक, 
     नफ़रत खल रेलम-रेला है। 

लगी हुई जीवन की मेला,
सद्भाव विरत सब खेला है
मानवता दानव मुख सेवित,
सत्ता चापलूस अब चेला है।

    भीड़-भाड़ आयातित जीवन, 
    मालामाल चपत शुभ बेला है
    न्याय नीति कहॅं त्याग समर्पण, 
    शैतान दुष्ट बस रेला है। 

शिक्षा दीक्षा जाति धर्म पथ,
बस राजनीति का खेला है
नर-नारी का भेद तिमिरमय,
लोक लाज मर्म शर्मीला है।

    भौतिक युग लालच मन मानव, 
    संवेदना शून्य हथगोला है
    कहॅं ईमान इन्सान मिले अब, 
    बस दंगा हिंसा मेला है। 

अहंकार सत्ता सुख भावन,
दरबार भाट अलबेला है
दीन-हीन अभिशाप समाजिक,
चकाचौंध जिंदगी मेला है।

      मस्ज़िद मंदिर गुरुद्वारा मठ, 
      चर्चों में भीड़ रसीला है
      जनमत कोष मुदित नेता दल, 
      बस धर्म-कर्म थल मेला है। 

भ्रष्टाचारी लूट गबन बस,
अभिव्यक्ति खेल बस खेला है
लोभ मोह मद शोक रोग जग,
सज समाज देश अब मेला है।

      राजनीति मेला आन्दोलन, 
      युवा राष्ट्र द्रोह बस झेला है
      आतंकी अरि दिया समर्थन, 
      तुष्टिकरण वोट का मेला है। 

लघुतर जीवन दुर्लभ मानव,
अविरत सतरंगी खेला है
खुशियाँ मुस्कानें सुख-दु:ख गम,
साधु ईश समागम मेला है।

    समरसता मेला सद्भावन, 
    न्याय नीति प्रीति रसीला है
    ईश भक्ति मन देश प्रेम तन, 
    सीमान्त शौर्य यश मेला है। 

आओ मधुरिम सुख मिठास मुख,
लगी आज परहित मेला है।
सारक्षता समता सब जनहित,
सुख अमन विभव शुभ बेला है॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥