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थम यायावर मन

ममता तिवारी
जांजगीर-चाम्पा(छत्तीसगढ़)
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आज फिर मन छोड़ द्रुतगामी घोड़ा पास पैदल निकल गया,
आज फिर जमे तहेदिल खुशियों का धधकता लावा पिघल गया।

आज फिर सुबह की किरण मुझसे लिपट-लिपट कुछ कहने लगी,
आज फिर एक चँचल-सी गिलहरी मेरे बगीचे में आकर रहने लगी।

आज फिर बरसाती से धुले नर्म कोमल पत्ते हरे-हरे डोल रहे हैं,
आज फिर स्वच्छ धूल,बिना धुली सड़के संकेतों से बोल रहे हैं।

आज फिर गमले में लगे खिली यूकेलिप्टस की कुछ कलियाँ,
आज फिर कुछ इतराती-मंडराती मचलती आई है तितलियाँ।

आज फिर कुछ सुरसुरी धीमे-धीमे पुरनम हवाएं चल रही हैं,
आज फिर दिल इन नजारों में डूब जाने को मचल- मचल रहा है।

आज फिर छत की तुलसी और सूरज,जल देता सुमन दिखा,
आज फिर थोड़ी-सी भीड़,शोर भरे इस शहर में अमन दिखा।

आज फिर मकड़ी सीढ़ी के नीचे आले-जाले-गूंथ रही,
आज फिर कांची खेलती पीहू झूठी-मूठी रूठ रही।

आज फिर कूद कर तैर रहे नहरों-तालाबो में बच्चे,
आज फिर पास की बेलों-बूटों लटके फल पक्के- कच्चे।

आज फिर दूर से मंदिरों के ध्वज हरष कर फहर रहे थे,
आज फिर कुछ मुसाफिर बादल,यहाँ आकर ठहर रहे थे।

आज फिर फेरी वाले आवाज दे घूम रहे गलियों में,
आज फिर मचल रही मछलियां जलघर की तलियों में।

आज फिर दूर दीवारों पर उगे पौधों को बकरी चरती दिखी,
आज फिर पड़ोसी की मुर्गियां फुदकती कुकड़ती दिखी।

आज फिर,मन चार दीवारी से बाहर हम देखने निकले हैं,
आज फिर एक दायरा तोड़ कुछ-कुछ हम बिखरे हैं।
आज फिर,नहीं हर रोज होते हैं ये सब नजारे,
हम ही हर रोज नहीं होते इनके,ये सब हैं ही हमारे।

सोचते हैं हम जैसे ये दुनिया वैसी ही तो लगती है,
हम रोते हैं तो लगती रोती-सी,हँसे तो लगती हँसती है॥

परिचय–ममता तिवारी का जन्म १अक्टूबर १९६८ को हुआ है। वर्तमान में आप छत्तीसगढ़ स्थित बी.डी. महन्त उपनगर (जिला जांजगीर-चाम्पा)में निवासरत हैं। हिन्दी भाषा का ज्ञान रखने वाली श्रीमती तिवारी एम.ए. तक शिक्षित होकर समाज में जिलाध्यक्ष हैं। इनकी लेखन विधा-काव्य(कविता ,छंद,ग़ज़ल) है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैं। पुरस्कार की बात की जाए तो प्रांतीय समाज सम्मेलन में सम्मान,ऑनलाइन स्पर्धाओं में प्रशस्ति-पत्र आदि हासिल किए हैं। ममता तिवारी की लेखनी का उद्देश्य अपने समय का सदुपयोग और लेखन शौक को पूरा करना है।