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दरवाजे की चीखें

इंदु भूषण बाली ‘परवाज़ मनावरी’
ज्यौड़ियां(जम्मू कश्मीर)

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मेरी डायरी-भाग ३
रात के 9 बज रहे थे और वह निर्दयी नशे में धुत मेरे दरवाजे को ईंटों से पीट रहा था,जिसकी ध्वनि मेरी झुग्गियों में रह रहे किरायेदारों के भी कान फाड़ रही थी। वह ईंटों के प्रहारों के साथ-साथ गाली-गलौज भी कर रहा था। अर्थात मेरी बची हुई जिंदगी को तार-तार कर बिन मौत मार रहा था।
मेरी जिंदगी की भांति दरवाजे की लोहे की चादर भी टेढ़ी होने की सीमा पार होने के बाद फट चुकी थी। झुग्गी वाले पड़ोसी समझा-समझा कर थक चुके थे,मगर वह ईंटों के प्रहारों में कमी करने के स्थान पर तेजी ला रहा था। वह ऐसा शाम लगभग साढ़े छह बजे से कर रहा था।
थक-हारकर जब मैं साढ़े नौ बजे अपनी झुग्गी से बाहर निकला तो वह अन्यों के साथ दरवाजे से तुरंत पीछे हट गए थे,किन्तु समय की नजाकत को देखते हुए मैं वहां से भाग गया था,क्योंकि स्थानीय पुलिस भी मेरी सुनवाई नहीं कर रही थी। वह इसलिए सुनवाई नहीं कर रही थी क्योंकि मेरे पढ़े-लिखे बेटे और उसके मित्रों ने मुझे पागल प्रमाणित कर दिया था। दूसरी तरफ दरवाजा तोड़ने वाला कोई बाहरी शत्रु नहीं,बल्कि मेरा सगा भतीजा कृष्णकांत बाली था। हालांकि,दरवाजे की तोड़फोड़ की जानकारी मैंने अपने मुहल्ले वालों को भी बताई-दिखाई थी और यह भी बताया था कि उक्त दरवाजे की बनवाई के पैसे भी देने अभी शेष हैं।
दूसरे दिन मेरे अन्य बड़े भाईयों के आने पर मुझे पता चला कि,उसे मेरे बड़े भाई ने ही मेरा ‘पागलपन’ ठीक करने हेतु जम्मू से ज्यौड़ियां भेजा था। इसलिए,वह निडर होकर मेरे सहित मेरे दरवाजे पर भी अपराधिक कार्रवाई कर रहा था,जिसे दण्ड का कोई भय नहीं था। चूंकि, मेरे घरवालों का उसे पूरा समर्थन था।
जब मुझे पागलपन से बाहर निकालने के लिए अन्य भाई मेरे घर ज्यौड़ियां आए तो सर्वप्रथम मैंने अपने ऊपर हुए अपराधिक उत्पीड़न की व्यथा सुनाई और टूटा हुआ दरवाजा दिखाया,जिस पर उन्होंने कहा कि ‘साले का साला’ हमारा कुछ नहीं लगता। वह दुबारा आपके घर नहीं आएगा। उपस्थित बड़े साले को पूछने पर उसने मेरे बड़े भाईयों को बताया कि पिछली बातें उसे याद नहीं हैं और हमारी माँ बूढ़ी हो चुकी है इसलिए उसने किसको क्यों व कैसे विवश किया,हमें कोई जानकारी नहीं है।
बेटे पर बडे़ भाईयों ने अपनी राय व्यक्त करते हुए कहा कि,बेटा स्वयं ही शर्मसार होगा। इसके अलावा उन्होंने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए बताया कि उन्हें आज मालूम हुआ है कि उसे राजनीति में धकेलने वाले तुम न होकर उसके स्वार्थी मित्र हैं,जबकि हम हमेशा तुम्हें ही दोषी मानते थे।
अब रही बात दरवाजा तोड़ने की तो उसने ‘शराब के नशे’ में ऐसा किया है। वैसे भी उस शराबी और जुआरी को यहां नहीं भेजना चाहिए था, क्योंकि उसने सरकारी नौकरी होते हुए भी माँ-बाप की जमीन बेच कर अपना घर बनाया है। वह तुम्हें क्या समझाएगा,जबकि तुमने जो दुकानें व झुग्गियां बनाई है,वह सराहनीय व महत्वपूर्ण कदम है।
उक्त शब्दों सहित मेरे घर आए हुए मेरे बड़े भाई और भाभियां तो चली गई थीं,मगर मेरे दरवाजे सहित मेरी आत्मा की चीखें आज भी चीख-चीख कर पूछ रही हैं कि अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान नई दिल्ली द्वारा मुझे मानसिक स्वस्थ होने का ‘प्रमाण-पत्र’ जारी करने के बाद भी क्या अब शराबी,जुआरी व जमीन बेचकर घर बनाने वाले मुझे शिक्षा देंगे ?

परिचय-इंदु भूषण बाली का साहित्यिक उपनाम `परवाज़ मनावरी`हैl इनकी जन्म तारीख २० सितम्बर १९६२ एवं जन्म स्थान-मनावर(वर्तमान पाकिस्तान में)हैl वर्तमान और स्थाई निवास तहसील ज्यौड़ियां,जिला-जम्मू(जम्मू कश्मीर)हैl राज्य जम्मू-कश्मीर के श्री बाली की शिक्षा-पी.यू.सी. और शिरोमणि हैl कार्यक्षेत्र में विभिन्न चुनौतियों से लड़ना व आलोचना है,हालाँकि एसएसबी विभाग से सेवानिवृत्त हैंl सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप पत्रकार,समाजसेवक, लेखक एवं भारत के राष्ट्रपति पद के पूर्व प्रत्याशी रहे हैंl आपकी लेखन विधा-लघुकथा,ग़ज़ल,लेख,व्यंग्य और आलोचना इत्यादि हैl प्रकाशन में आपके खाते में ७ पुस्तकें(व्हेयर इज कांस्टिट्यूशन ? लॉ एन्ड जस्टिस ?(अंग्रेजी),कड़वे सच,मुझे न्याय दो(हिंदी) तथा डोगरी में फिट्’टे मुँह तुंदा आदि)हैंl कई अख़बारों में आपकी रचनाएं प्रकाशित हैंl लेखन के लिए कुछ सम्मान भी प्राप्त कर चुके हैंl अपने जीवन में विशेष उपलब्धि-अनंत मानने वाले परवाज़ मनावरी की लेखनी का उद्देश्य-भ्रष्टाचार से मुक्ति हैl प्रेरणा पुंज-राष्ट्रभक्ति है तो विशेषज्ञता-संविधानिक संघर्ष एवं राष्ट्रप्रेम में जीवन समर्पित है।