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दानवीर कर्ण

रत्ना बापुली
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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निर्मल नीर के सरोवर तीर,
बैठ तरूवर की छाया
कर्ण कर रहा था ध्यान,
त्याग वसुधा की माया।

तभी दैदिप्यमान रवि,
फैल गया चहुँ ओर
स्वंय दिनकर खड़े,
सामने उसके ठौर।

दिनकर बोले-‘हे पुत्र,
सुनो मेरे कर्ण लाल
कुन्ती तेरी माता है,
मैं तेरा तात नभ पाल।

मैं ही दिया था तुम्हें,
कवच कुण्डल रक्षार्थ
आज वही माँगने आ रही,
तेरी माँ निज स्वार्थ।

तू सबसे बलशाली है,
पांडव पुत्र भी है तू
पर माँ की बदनामी से,
बना सूत पुत्र ही तू।

पृथ्वी के वासी होकर,
हर प्राणी बनता स्वार्थी
तेरी माँ का भी दोष नहीं,
वह भी बनी आज स्वार्थी।

तभी तो त्याज्य तुझे,
लुटाती पांडव पर ममता
उसे ज्ञात है सब कुछ,
नहीं है तेरी कोई समता।

तू है अजेय जब तक है,
तेरे पास कवच व कुण्डल
भूल से भी मत त्यागना,
तेरे जीवन का जो संबल।’

‘पर तात भले ही मेरी माँ,
मुझ पर न हो अनुरक्त
पर मैं कैसे हो जाऊँ रिक्त,
दान से हो जाऊँ विरक्त।

मृत्यु सत्य है इस जग में,
कैसे न मैं स्वीकार करूँ
माटी जैसे जीवन हेतु,
कैसे न मैं दान करूँ।

हो जाने दो विजयी पाडंव,
यदि धर्म यह कहता है
नियति बड़ी बलवान,
उससे कौन उलझता है।

मुझे गर्व है माँ की खातिर,
मेरा जीवन बलिदान हुआ
माँ ही धरती, माँ ही धर्म,
जिनके हित मेरा दान हुआ।

बस एक पीड़ा है रिसती,
मेरे मन के कोने में
माँ की गोदी में न खेला,
लोरी सुनी न सोने में।

इतना ही संतोष मुझे है,
युद्घ भूमि के प्रांगण में
मेरी लाश देख कर माँ,
छुप के रोएगी महल में।

यूँ ही नहीं कोई दानवीर,
इस जहाँ में कहलाता है।
निज जीवन का जो दे दान,
वही दानवीर कहलाता है॥

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