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देखो होली का रंग छाया

ताराचन्द वर्मा ‘डाबला’
अलवर(राजस्थान)
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रंग और हम(होली स्पर्धा विशेष )…

अच्छा हुआ जो पड़ोसन ने मुझे,
गुलाल लगा दिया
वर्ना बीवी के सामने तो चहरे का,
रंग ही उड़ जाता है।

कमबख्त रोज ताने मारती है,
जीने नहीं देती है
कभी प्यार से पास बुलाता हूँ,
वो दुत्कार देती है।

मैंने कहा-आज तो होली है,
जरा मुस्कुरा दीजिए
कभी तो इश्क फरमाने का,
हमें मौका दीजिए।

जैसे ही प्यार से छुआ,
उसने जोर का झटका दिया
मुझे होश ही नहीं रहा कब,
भैंस के पिछवाड़े जा गिरा।

एक पल के लिए मैं ठिठका,
भैंस ने मारा या बीवी ने !
शायद मैंने ही ज्यादा पी ली है,
इसीलिए ये पतलून गीली है।

वो शेरनी की तरह गुर्राई,
पड़ोसन का ताना दिया
समझ में नहीं आया,
ये सब किसने बता दिया।

मैंने कहा-सब झूठ है,
तुझे किसी ने भड़काया है।
गुस्सा थूक तो जानेमन,
देखो होली का रंग छाया है॥

परिचय- ताराचंद वर्मा का निवास अलवर (राजस्थान) में है। साहित्यिक क्षेत्र में ‘डाबला’ उपनाम से प्रसिद्ध श्री वर्मा पेशे से शिक्षक हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कहानी,कविताएं एवं आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आप सतत लेखन में सक्रिय हैं।

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