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देश-विदेश में हिन्दी का प्रतिष्ठापन हो

रत्ना बापुली
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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पृथ्वी के विराट रूप की कल्पना में जहाँ ओ$म की ध्वनि प्रतिध्वनित होती है, वह क्या है। हम लोगों की एक-दूसरे के प्रति भावनाओं का आदान-प्रदान ही तो है। हमारे वेद मंत्र, ऋचाएँ सभी का मूल संस्कृत भाषा है, जो स्वयं ही एक गीतात्मक लयात्मकता को धारण किए हुए है। इसी संस्कृत भाषा को जननी मानते हुए हमारे भारत में कई भाषाओं का आविष्कार हुआ या यूँ कहिए कि स्वतः ही भारत में छा गया। संभवतः जिसका कारण सहजता एंव सरलता ही रही होगी।
अँग्रेजों के पहले भारत के स्वर्णमयी रूप की व्याख्या सुन अनेक विदेशी आक्रमणकारी आए एवं उन्होंने अपनी भाषा को भारतीयों मे हस्तान्तरित किया। उस समय भारत की भाषा में  हिन्दी की अनेक क्षेत्रीय भाषाओं का समावेश हो चुका था, जिसकी आत्मा संस्कृत ही थी। अतः, भारतीयों को विदेशी भाषा को भी अंगीकार करने में कोई कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ा। सहज एंव सरल रूप में वे एक-दूसरे के साथ मिलते गए, जिसमें आपस के प्यार ने भी अपनी महती भूमिका निभाई। राजनीतिक हठ एवं पशुता की भावना को जनमानस से दूर रखकर भाषा ने अपना विस्तार शनै:-शनै: कर लिया। पृथ्वी के विस्तार को यदि देखा जाए तो पृथ्वी-जो विश्व कहलाया, जिसमें भौगोलिक दृष्टि से भारत देश भले ही छोटा-सा देश हो, पर इसकी संस्कृति एवं इतिहास विश्व पटल पर अग्रणी है। नालन्दा विश्वविद्यालय का शौर्य एवं प्रसिद्धी इस बात का प्रमाण है, पर अनेक ईर्ष्यालु तत्वों ने इस पर कुठाराघात कर इसे नेस्तानबूत कर दिया। संहार चाहे ऊपरी आवरण का होता रहे, पर मूल तत्व हमेशा अपना अस्तित्व बनाए रखता है तो भाषा ने भी अपना मूल सहजता से बनाए रखा।
भारत के राजनीतिक उथल-पुथल ने जितना प्रभाव भाषा पर डाला है, शिक्षा पर डाला है उतना अन्य किसी पर नहीं। मुसलमानों के आगमन पर जहाँ ऊर्दू भाषा हिन्दी के साथ मिलकर एकाकार हो गई, वही अँग्रेज़ी भाषा ने भी अपना तीर छोड़ा अपनी भाषा को भारत की राजनीतिक भाषा बनाने को। मैकाले की शिक्षा नीति ने न केवल अँग्रेजी भाषा को प्रभुता दिलाई, वरन् भारत की गुरूकुल प्रणाली पर भी इतना कुठाराघात किया कि, वह आज तक उबर नहीं पाई।
आज देश जब अपना ७५ वा स्वाधीनता दिवस मना रहा है, तब देश ने यह अनुभव किया है कि, भले ही हम जमीन को लेकर विस्तारवादी परम्परा न अपनाएं, पर भाषा को तो हम विस्तार दिला ही सकते हैं। इसी भावना से प्रेरित होकर हिन्दी भाषा के अनेक प्रेमियों ने अपनी भाषा की सारगर्भिता को विदेशों में फैलाया जिसमें कई नाम प्रमुख हैं। इसके लिए हमें जी-जान से लग जाना है। भाषा का तात्पर्य आपस का प्यार है, जिसके भरोसे हमें अपनी हिन्दी भाषा का विदेशों में प्रतिष्ठापन  करना है।

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