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धन्यवाद ज्ञापन पितर

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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पितृ पक्ष विशेष…..

पावन मंगल भोर यह,पितृपक्ष जलदान।
तर्पण अर्पण पितर का,पुण्य अर्घ्य दें मान॥

पितरों को श्रद्धा प्रकट,तील कुश फलदान।
पाऍं आशीर्वाद को,देकर कुल सम्मान॥

पितरों को करने मुदित,तर्पण करें प्रणाम।
पिण्ड श्राद्ध करते तनय,पितृपक्ष अविराम॥

शास्त्रों में महिमा विदित,तर्पण पितृ महत्व।
पितर स्वयं आते धरा,दे आशीष ममत्व॥

काश तील जौ द्रव्य फल,तिकुशा कुश जल हाथ।
वैदिक विधि तर्पण करें,सकल वस्तु ले साथ॥

तर्पण जल श्रद्धा सुमन,हों कृतज्ञ कुलमान।
दिया जन्म दुर्लभ मनुज,पाल पोस अवदान॥

मातृ-पितृ पूर्वज पितर,तर्पण जल सम्मान।
पाऍं यश वैभव ख़ुशी,मंगलमय मुस्कान॥

पुरखों की यादें हृदय,पितृपक्ष ध्यातव्य।
धन्यवाद ज्ञापन पितर,सन्तति नित कर्तव्य॥

सन्ध्यावंदन कर करें,तर्पण पितर महान।
मानक पितृ कृतज्ञता,सदाचार कुल मान॥

सादर स्नेहिल नमन हिय,श्राद्ध पिण्ड जलदान।
पौरुष यश बल सुख विभव,पुरखों! दें वरदान॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥

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