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धरा पुत्र

क्षितिज जैन
जयपुर(राजस्थान)
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विश्व धरा दिवस स्पर्धा विशेष………

जो कर समर्पित जीवन अपना,
करते रक्षित समस्त यह नृवंश
अपने बलिदानों से सहते रहते,
प्रकृति पर लगते जो विष दंश।

कर पुरुषार्थ अहर्निश इस दिशा में,
अमृत पान कराते इस धरातल को
साधना कर गला गला देह अपनी वे,
पूजते नभ अग्नि वायु वसुधा जल को।

कहें दुनिया कुछ भी उन्हें कटुता से,
न करते किंचित भी वे वीर परवाह
रोप कर पौधे भविष्य के समृद्धि हेतु,
दिखाते मानव जाति को नई एक राह।

पाप के गड्ढे को हम सबके वे महापुरुष,
त्याग की गंगा से अविरत भरते हैं
पुनीत सेवा यज्ञ से माता पृथ्वी का वे ही,
दाहक-सा आताप सदैव हरते हैं।

आज नहीं तो कल यह मानव समाज,
उनके मार्ग को अवश्यमेव अपनाएगा
नहीं किया आत्मबोध अभी भी यदि,
तो मानव बेमौत ही मानो मर जाएगा।

देखते नहीं मानवता के सम्मुख वे कभी,
देश जाति धर्म और समाज के क्षुद्र बंध
जब उठाते बीड़ा धरा की रक्षा का उनके,
कर्म को उद्द्यत सुदृढ़ तत्पर स्कंध।

यह ‘धरा दिवस’ है मानो उन धरा पुत्रों का,
मानवता को किया गया तेजोदीप्त आह्वान
ऐसे महापुरुषों का आगामी युग करेगा,
शीश झुकाकर श्रद्धापूर्वक आगे सम्मान॥

परिचय-क्षितिज जैन का निवास जयपुर(राजस्थान)में है। जन्म तारीख १५ फरवरी २००३ एवं जन्म स्थान- जयपुर है। स्थायी पता भी यही है। भाषा ज्ञान-हिन्दी का रखते हैं। राजस्थान वासी श्री जैन फिलहाल कक्षा ग्यारहवीं में अध्ययनरत हैं कार्यक्षेत्र-विद्यार्थी का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत धार्मिक आयोजनों में सक्रियता से भाग लेने के साथ ही कार्यक्रमों का आयोजन तथा विद्यालय की ओर से अनेक गतिविधियों में भाग लेते हैं। लेखन विधा-कविता,लेख और उपन्यास है। प्रकाशन के अंतर्गत ‘जीवन पथ’ एवं ‘क्षितिजारूण’ २ पुस्तकें प्रकाशित हैं। दैनिक अखबारों में कविताओं का प्रकाशन हो चुका है तो ‘कौटिल्य’ उपन्यास भी प्रकाशित है। ब्लॉग पर भी लिखते हैं। विशेष उपलब्धि- आकाशवाणी(माउंट आबू) एवं एक साप्ताहिक पत्रिका में भेंट वार्ता प्रसारित होना है। क्षितिज जैन की लेखनी का उद्देश्य-भारतीय संस्कृति का पुनरूत्थान,भारत की कीर्ति एवं गौरव को पुनर्स्थापित करना तथा जैन धर्म की सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-नरेंद्र कोहली,रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हैं। इनके लिए प्रेरणा पुंज- गांधीजी,स्वामी विवेकानंद,लोकमान्य तिलक एवं हुकुमचंद भारिल्ल हैं। इनकी विशेषज्ञता-हिन्दी-संस्कृत भाषा का और इतिहास व जैन दर्शन का ज्ञान है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपका विचार-हम सौभाग्यशाली हैं जो हमने भारत की पावन भूमि में जन्म लिया है। देश की सेवा करना सभी का कर्त्तव्य है। हिंदीभाषा भारत की शिराओं में रक्त के समान बहती है। भारत के प्राण हिन्दी में बसते हैं,हमें इसका प्रचार-प्रसार करना चाहिए।