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धर्म, जाति और संविधान में सर्वोच्च क्या ?

राधा गोयल
नई दिल्ली
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सबसे पहले मैं जाति की बात, यह जातियाँ आखिर हैं क्या ? हम लोगों ने ही जातियाँ बनाई हैं। पहले जातियाँ जन्म के आधार पर नहीं, अपितु कर्म के आधार पर केवल ४ थीं-ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय और शूद्र। जो समाज को ज्ञान देता था, वह ब्राह्मण कहलाता था। जो समाज की रक्षा करता था, वह क्षत्रिय। जो व्यापार करता था और समाज को धन व धान्य उपलब्ध करवाता था, उसमें चाहे व्यापारी वर्ग हो या हमारे अनाज उत्पन्न करने वाले किसान भाई, ये सभी वैश्य वर्ग से ताल्लुक रखते थे। जो समाज को अपनी सेवाएँ प्रदान करते थे, पालकी आदि उठाते थे, समाज को स्वच्छ रखने में सहायता देते थे, वे शूद्र। जन्म से कोई भी नीच या महान नहीं था। सब कुछ कर्म के आधार पर था। हम इंसानों ने ही बाद में जातियाँ और उप जातियाँ बना डालीं। जिसने भी इस जाति-पाति का विरोध किया बाद में उसके नाम पर भी जातियाँ बना डालीं।
धर्म क्या है ? सूरज का धर्म चमकना है, रोशनी देना है। वह अपनी रोशनी किसी की जाति पूछ कर नहीं देता। सभी को एक समान रोशनी देता है। चंद्रमा का धर्म शीतलता देना है, चाँदनी देना है। वह किसी से उसका धर्म पूछ कर अपनी आभा नहीं बिखेरता। धर्म केवल एक है इंसानियत, मानवता।हमारा देश सनातन काल से कहता आया है-
‘सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत।’
सभी धर्मों ने एक ही बात कही है, लेकिन बाद में कुछ लोगों ने, खासकर ब्राह्मण समुदाय ने जाति-पांति की ऐसी दीवार खड़ी कर दी कि इस समाज का स्वरूप ही बदल डाला। कई लोगों ने तो तुलसीदास की रामायण हो या वाल्मीकि रामायण हो…….
उनमें भी शब्दों को तोड़-मरोड़ कर ऐसे पेश कर दिया और ऐसे गलत अर्थ निकाल दिए कि अर्थ का अनर्थ कर डाला।
जैसे- तुलसीकृत रामायण में लिखा है-
‘ढोर, गंवार, शूद्र, पशु, नारी
सकल तारणा के अधिकारी।’
लोगों ने ‘तारण’ की जगह ‘ताड़न’ और ‘ढोर’ की जगह ‘ढोल’ लिखना शुरु कर दिया। बार-बार यही बात दोहराते-दोहराते लोगों ने इसी बात को सत्य मान लिया और गलत तरह से इस को परिभाषित करना शुरू कर दिया कि तुलसीदास जी ने भी यही कहा है।-
‘ढोल गंवार शूद्र पशु नारी,
सकल ताड़ना के अधिकारी।’
राम ने तो भीलनी शबरी के झूठे बेर खाए थे। भील और वानरों की सेना बनाई थी। यह तुलसीकृत रामायण में ही वर्णित है तो तुलसीदास जी ऐसा क्यों लिखेंगे ? तुलसीदास जी कृत रामायण में लिखा है-
‘ढोर, गंवार, क्षुब्ध पशु, रारी।’
ढोर गंवार मदमत्त जानवर और बात-बात में रार ठानने वाले व्यक्ति को ठोकना बहुत जरूरी होता है।
नारी…जिसे समाज शोषित करता रहा है। जैसे कि उसी जमाने में गौतम ने अहिल्या का त्याग किया था और सारे समाज ने अहिल्या का बहिष्कार कर दिया था। तब श्रीराम ने ही अहिल्या को उसका खोया हुआ सम्मान दिलाया था। श्रीराम ने इसके द्वारा समाज को एक संदेश भी दिया कि सभी को समाज में बराबरी से जीने का हक है और समाज का यह फर्ज है कि इन सबको आदर की दृष्टि से देखे।
कभी इसी बात को कहने के लिए ईसा मसीह को सूली पर टाँग दिया गया और एक अलग जाति बन गई ‘ईसाई।’
कभी इसी बात को कहने के लिए पैगंबर मोहम्मद को पत्थर मार-मारकर देश से बाहर निकाल दिया गया। बाद में उन्हीं के नाम से एक अलग जाति बन गई इस्लाम। गुरु गोविंद सिंह ने और अन्य नौ गुरुओं ने अत्याचार के विरुद्ध लड़ाई की, लेकिन बाद में वह भी एक अलग जाति बन गई सिक्ख। गाँधी जी ने भेदभाव को दूर करने के लिए नाम दिया ‘हरि के जन’ यानि हरिजन कहा, लेकिन वह भी बाद में एक अलग जाति बन गई ‘हरिजन’.. …जो लोगों ने अपने स्वार्थ वश बना डाली।
आरक्षण में विलुप्त होती जातियों-प्रजातियों के संरक्षण व संवर्धन के लिए प्रावधान बनाया था। जो जातियाँ कभी कर्म के आधार पर थीं, हम लोगों ने उसको जन्म के आधार पर बाँट दिया।
न जाने कब समाज में धीरे-धीरे इन विसंगतियों ने जन्म लिया और आज यह अपनी जड़ें इतनी बुरी तरह फैला चुकी हैं कि इनका समाधान होना बहुत जरूरी है। यह तभी होगा जब आरक्षण का गंदा खेल समाप्त होगा। संविधान इसीलिए बनाया गया था कि समाज में दलितों को दलित समझा जा रहा था। अपने-आपको उच्च जाति का कहने वालों ने दलित लोगों का पूर्ण रूप से बहिष्कार कर दिया था। संविधान में विलुप्त होती हुई प्रजातियों के लिए शेड्यूल बनाया गया था। समाज की मुख्यधारा में आ सकें, इसलिए इन्हें श्रेणीगत किया गया ताकि विलुप्त होती जातियों को संरक्षण व संवर्धन प्रदान किया जाए। बाद में कुछ स्वार्थी लोगों ने इसका भी गलत फायदा उठाया। एक कानून बन गया कि किसी को शेड्यूल कास्ट कहने का अधिकार नहीं है। अब उन लोगों ने इसका इतना अधिक नाजायज फायदा उठाया कि उनको चाहे किसी ने दलित न भी कहा हो, तब भी वे किसी से अपनी खुन्नस निकालने के लिए शिकायत कर देते हैं।
सभी जानते होंगे कि कुरुक्षेत्र के युद्ध के ३६ वर्ष बाद यादव सेना व वृष्णि सेना (कृष्ण और बलराम की सेना ) में शराब के मद में चूर होकर जबरदस्त लड़ाई हुई। यादवों को यह घमण्ड था कि कुरुक्षेत्र की लड़ाई उन्होंने जीती है। शराब के मद में चूर दोनों सेनाएँ एक-दूसरे से लड़ने लगीं। बलराम और कृष्ण ने बहुत रोकने की कोशिश की। असफल रहने पर बलराम ने स्वयं ही अपनी वृष्णि सेना को मारना शुरू कर दिया था और लगभग सारा यदुकुल समाप्त ही हो गया था। केवल बूढ़ी औरतें, बूढ़े मर्द और बच्चे ही बचे थे, जिन्हें अर्जुन हस्तिनापुर ले गए थे। आज ऐसे गौरवशाली पूर्वजों के वशंज भी आरक्षण की माँग कर रहे हैं और अपने पूर्वजों को लज्जित कर रहे हैं।
दलित-शोषित लोगों को समाज में बराबरी का हक देने के लिए यह प्रावधान १० वर्ष के लिए किया गया था, लेकिन सत्ता के ठेकेदारों ने उसमें भी अपना स्वार्थ ढूँढ लिया। जो कभी दलित कहलाते थे, उनको नौकरियाँ मिल गईं। नौकरियों में भी जब प्रोन्नति के अवसर आए तो हर ३ वर्ष बाद उनको तो प्रोन्नति मिल गई लेकिन उच्च वर्ग को २० साल बाद भी प्रोन्नति नहीं मिली। इसका अंजाम यह हुआ कि दलित उच्चतम पद पर बहुत शीघ्र पहुँच गया और मेधावी वर्ग वहीं का वहीं रहा।
जो आरक्षण प्राप्त लोग अच्छे भले पद पर आसीन हो गए हैं, आज तक भी आरक्षण के आधार पर उस वर्ग की संतानें नौकरियों में आरक्षण का लाभ ले रही हैं। एक बार उस वर्ग को नौकरी मिल चुकी है तो पुनः आरक्षण किसलिए ? पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण किस लिए ???
१० साल के बाद आरक्षण बंद हो जाना चाहिए था।यह इसलिए किया गया था कि, सभी एक समान स्तर तक पहुँच जाएँ लेकिन आज सभी देख रहे हैं कि इस आरक्षण के खेल ने देश में कितनी आगजनी की है।

इतना आन्दोलन सड़कें बनाने, नहर बनाने, पानी के संरक्षण और बाढ़ से निपटने के उपाय करने, देश की स्वच्छता और मन की स्वच्छता में लगाते तो भारत कभी का विश्वगुरू बन गया होता।