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धार्मिकता के नाम पर हिंसा अनुचित

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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दुनिया में धर्म के नाम पर सबसे अधिक हिंसाएं हुई हैं और उसके बाद स्त्रियों के नाम से बहुत युद्ध। जब हम अशिक्षित, अनपढ़, गंवार या आदिमयुगीन थे, तब ये सब कार्य होते थे तो भी मान्य थे, पर जब हम २१वीं शताब्दी में जा रहे हैं, जहाँ ज्ञान-विज्ञान की खुली छूट है, उसके बाद भी यदि हम आदिमयुगीन क्रियाएं धर्म के नाम पर कर रहे हैं तो यह हमारी योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। क्या जीव-हिंसा धर्मों में मान्य है ? क्या धार्मिक क्रियाएं हम घिसी-पिटी लकीर की भांति बढ़ा या घटा नहीं रहे हैं ?
एक विशेष समुदाय बकरीद पर असंख्य जीवों की हिंसा करता है वह भी धर्म के नाम पर! क्योंकि, उनकी धार्मिक पुस्तकों में लिखा गया है, पर बारीकी से पढ़े तो पाएंगे कि, अपने स्वार्थ के कारण हमने हिंसा करने का सुगम मार्ग निकाल लिया है और कुछ नहीं। यदि एक बार निश्चित कर लें कि, हमें हिंसा नहीं करना है, तब देखें कौन-कितना नाराज़ होता है ?
नवरात्रि के पुण्य पर्व के दौरान हम सभी हिंसा से दूर रहकर सात्विक भावों से व्रतों का पालन करते हैं, पर यहाँ पर भी कुछ रूढ़िवादी प्रवृत्ति के कारण हम पुरानी मान्यताओं का प्रश्रय लेकर कितनी हिंसा करते हैं, यह धर्म के साथ जीव-दया के विपरीत है।
लोग मुगालते में जी रहे हैं कि, यदि हमने अमुक क्रियाएं धर्म के नाम पर नहीं की तो भगवान् कुपित हो जाएंगे, नाराज़ हो जाएंगे, दंड देंगे, पर वास्तव में दंड हमें अपने किए हुए कर्मों के कारण मिलते हैं।
हाल ही में समाचार-पत्र द्वारा जानकारी मिली कि, मंदिरों की पूजा के दौरान ४० किमी तक मदिरा की धारा लगाते हुए चले हैं । यह क्रिया मान्यता के अनुसार मान्य हो सकती है, पर इस प्रकार का कार्य कितना लाभप्रद और उपयोगी है ? यह श्रद्धा का विषय हो सकता है, पर इस दौरान अनंतानंत जीवों की हिंसा करना कितने पुण्य का कार्य होगा ? इस दौरान किया गया सब धर्म निरर्थक होगा।
मद्य, मन को मोहित करती है और मोहित चित्त धर्म को भूल जाता है। यानि वह जीव हिंसा रूप का आचरण करने लगता है। अभिमान, भय, जुगुप्सा, रति, शोक तथा काम-क्रोधादि जितने हिंसा के भेद हैं, वे सब मदिरा के निकटवर्ती हैं। मदिरा की एक बून्द के जीव यदि फैल जाएं तो तीनों लोकों को भी पूर्ण कर देते हैं। जिस मद्य द्वारा मूर्च्छित मनुष्य इस लोक और परलोक को नष्ट कर देते हैं, उस मद्य को कल्याणर्थी मनुष्य अवश्य ही छोड़े। इसके पीने से पहले तो बुद्धि भ्र्ष्ट होती है, अर्थात माता-बहन आदि को भी स्त्री समझने लगता है। उनसे अन्यायरूप क्रियाएं तथा अत्यंत क्लेश रूप जन्म मरण होता है।

हम अहिंसा प्रधान देश में रहते हैं और जिसकी दिन-रात दुहाई देते हैं। फिर हम मांस और मद्य का सेवन कर आगामी जन्म के लिए कितना पाप कर रहे हैं, और उस कारण भविष्य में कितना कष्ट उठाना होगा, वह अकल्पनीय है। इसका विकल्प है कि, गरीब, असहाय, निःशक्तजनों को समुचित सहयोग दें। मद्य की जगह मिठाई, फल, मेवा-मिष्ठान बांटें और देखें कि, आपको कितनी शांति- सुख की अनुभूति होगी।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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