ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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समय बीतता जाता है,
परिवर्तन होता रहता है
आज ये कल बनता जाता है,
औेर कल, कल होता रहता है।
अपना, पराया बनता जाता है,
पराया, अपना बनता रहता है
तू-तू, मैं-मैं और मैं-मैं, तू-तू,
हर कोई करता रहता है।
आज जो बनता जाता है,
वो कल बिगड़ता जाता है
आज जो सदमा लगता है,
कल आदत बनता जाता है।
वक़्त-वक़्त की कीमत होती है,
एक समय घाव भर जाता है
अमीर, गरीब बन जाता है,
गरीब, अमीर बनता जाता है।
सृष्टि का यही नियम है,
धैर्य कभी तुम खोना नहीं।
कड़ी मेहनत रंग लाती है,
सब्र का फल मीठा होता है॥