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नजरअंदाज न करें ‘लू’ को

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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वर्तमान में बहुतायत में आर्थिक सम्पन्नता के कारण ए.सी., कूलर और पंखे का होना आम बात है। इनका उपयोग यदि समझदारी से न किया जाए तो, गर्मी में लू (हीट स्ट्रोक) की चपेट में आ जाते हैं। होता यह है कि, हम घर, ऑफिस में ए.सी. और कूलर में बैठकर काम करते हैं। अचानक काम आने पर हम धूप में निकल जाते हैं और तब हमारे शरीर का तापक्रम धूप के तापक्रम से मेल न खाने यानि असंतुलित होने से हम लू की चपेट में शीघ्र आ जाते हैं। इसके लिए जाने के पूर्व अपने शरीर का तापक्रम इतना कर लें कि बाह्य तापमान का कोई विपरीत प्रभाव न पड़े। बाहर निकलते समय पानी पीकर निकलें। गर्मी में जितना हो सके बच्चों को शीतल पेय से दूर रखें। शिकंजी पीने को दें और गुड़ को दही में मिलाकर खिलाएं।
गर्मी अपने साथ कई बीमारी लेकर आती है। इसमें सबसे खतरनाक लू है। भीषण गर्मी में बच्चे इसकी चपेट में जल्दी आते हैं, ऐसे में उनका खास ख्याल रखना चाहिए। शरीर में पानी की कमी से डि-हाइड्रेशन होने की संभावना बढ़ जाती है। गर्मी में ज्यादा देर धूप में रहने से शरीर से अधिक मात्रा में पसीना निकलने के कारण पानी की कमी हो जाती है। इससे सिरदर्द, थकान, सुस्ती, भूख का कम होना, बदन में ऐंठन, उल्टी होना, पेट मे दर्द, जलन, दस्त, चक्कर आने के साथ ही मानसिक संतुलन बिगड़ने जैसे हालात पैदा हो जाते हैं।
चूंकि, इंसान का शरीर ३७ डिग्री तक तापमान सहन करने में सक्षम होता है।इससे ऊपर जाने पर शरीर में कई प्रकार की दिक्कत महसूस होने लगती है। शरीर से पानी खत्म होने लगता है और खून गाढ़ा हो जाता है। ऐसे में बच्चों के अलावा सबके मामले में खास एहतियात बरतनी चाहिए।
गर्मी में भोजन विषाक्तता होने की आशंका बढ़ जाती है, इसलिए कटा हुआ फल न खरीदें। देर से रखा हुआ खाना न खाएं। खुले में बिकने वाले तले हुए खाद्य पदार्थों का सेवन किसी को भी नहीं करना चाहिए।
ऐसे ही बाहर निकलते समय बच्चों को ढीले-ढाले कपड़े पहनाएं। इससे बाहर की हवा लगती रहेगी। सूती कपड़े पहनना ज्यादा बेहतर होगा। कहीं भी खाली पेट बिल्कुल भी न ले जाएं ये सारी सावधानी बड़ों को भी अपनानी चाहिए। जरूरत पड़ने पर चिकित्सक से सलाह लें।

इस मौसम में हमारा खान-पान जितना सादा, संतुलित और सुरक्षित होगा उससे अपने को बीमार होने से बचा सकते हैं। इस समय कच्चे आम का पना, उसमें पोदीना, सिका जीरा, शक्कर या गुड़ का उपयोग लाभकारी होता है। तरबूज में आजकल मिठास हेतु सैक्रीन और लाल रंग के लिए हानिकारक रसायनों का उपयोग करते हैं, तो सावधानी बरतने की जरुरत है। पानी जितना स्वच्छ हो, उतना लाभप्रद है। गंदे या प्रदूषित पानी से पेट सम्बन्धी रोग जल्दी होते हैं, इसलिए धूप में जाने के पूर्व सावधानियाँ रखें, क्योंकि बचाव ही इलाज है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।

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