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नजरिया बदले मनुष्य

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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हर एक शब्द का अपना दृष्टिकोण होता है, वह अर्थ को भी व्यर्थ में बदलता है। ज़िन्दगी के इन २ पलों में सिर्फ ४ दिन ही मिलते हैं, और यहाँ जीवन, जो कभी भी रुकता नहीं है; वह तो अनंत यात्रा पर ही होता है। हम आज-कल की भाषा में कहें तो “मुसाफिर हूँ यारों, ना घर है, ना ठिकाना, बस चलाते जाना है।” अर्थात मनुष्य का जीवन अल्प समय का ही है। फिर भी वह सब भूलकर बरसों की सोच में अर्थपूर्ण मानव रत्न जीवन को व्यर्थ की बातों में यानी समय बर्बाद कर देता है, और अंत समय में पछतावा करता है। हमें ध्यान रखना होगा कि सफ़र हमेशा जारी रखें, इसमें ठहरना यात्रा खत्म होने का सूचक बन जाता है। फिर भी मुसाफिर चिंता में चेतना को खो देता है, और खाली हाथ दुनिया में आता है, तथा खाली हाथ ही जाता है, लेकिन कर्म भाव में वह महल, चौबारे, धन, संपत्ति जोड़-जोड़ कर तिजोरी भरने के बाद भी वह साथ ले नहीं जा पाता है।    

      भारतीय धर्म में जो बात कही है- आगम निगम के बंधनों की, उस अज्ञानता में सब कुछ गंवा देता है। मनुष्य अपनी चेतना को भूलकर जीवन के सरोकार खत्म कर देता है। भगवान जिसे जमीं पर साधक के रुप में भेजते हैं, वही साधन में अपने हित में लालच, घमंड, क्रोध,
माया, लोभ में बंधकर दिनचर्या में  उलझ जाता है। यात्री को लगता है, कि यही उसका असली मुकाम है। इसलिए रवानगी को भूल कर संसार के बंधन में बंध जाता है। अपने-आपको सबसे बड़ा व महान  समझता है। ईश्वर को भूल कर धन-दौलत-दिखावे में जीवन खपा देता है। आखिरी समय उन लोगों का बहुत बुरा हाल होता है, क्योंकि जैसी करनी वैसी भरनी।
   हमारे पूर्वज कहते थे, कि स्वर्ग व नरक की यात्रा बहुत कठिन है, मरने के बाद सब भोगना पड़ता है, लेकिन इस कलयुग में यहीं कर, यहीं भर वाली बात सच्ची दिखाई देती है। जो माता-पिता व बड़े-बुजुर्ग की सेवा नहीं करते, वह चाहे कितने मंदिर चले जाएं, तीर्थयात्रा कर लें सब व्यर्थ ही है। अर्थ तो सेवाभाव का है, मनुष्य जन्म का सार समझने का है। इसलिए मनुष्य को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। मुसाफ़िर तो इंसान हैं, लेकिन ४ दिन की इस जिंदगी में पूरी तरह उल्लास व आनंद पूर्वक जीएं, क्योंकि जीना इसी का नाम है।
  यह शरीर तो क्षणभंगुर है। काया तो मिट्टी में मिल जाएगी, फिर क्यों हम बरसों की सोचते हैं। अगर इस बात को जान लिया तो मनुष्य कभी राह नहीं भटकेगा।