अजय जैन ‘विकल्प’
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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घर का उजाला… बेटियाँ (राष्ट्रीय पुत्री दिवस (२५ सितम्बर) विशेष)…
आँगन में जो हँसी बिखरती, बेटी नाम है उसका,
घर की दीवारें भी तब लगतीं, जैसे धाम है उसका।
बेटी नहीं है बोझ कभी, वो तो सौगात है रब की,
उसके कदमों से ही तो, किस्मत बदलती सबकी।
एक बेटी पढ़ती है तो, पूरी पीढ़ी पढ़ जाती,
उसकी एक मुस्कान से, घर की शाम संवर जाती।
चूड़ी की खनक नहीं, वो साहस की झंकार है,
बेटी आज किसी से कम नहीं, वो खुद एक संसार है।
बाप की थकान हर लेती, माँ की सखी बन जाती है,
मकान, घर बन जाता है; जब बेटी घर में होती है।
दहलीज लांघ कर भी वो, संस्कार नहीं छोड़ती,
दो कुलों की लाज को, अपनी हथेली पर जोड़ती।
बेटा है तो वंश चलेगा, ये किसने कहा था ?
बेटी से ही वंश नहीं, वंश का मान बढ़ा था।
उजाला केवल दीया नहीं, बेटियों से भी होता है,
अंधेरे में जब सब रूठे, वो दीया-सा साथ होता है।
‘राष्ट्रीय पुत्री दिवस’ नहीं, हर दिन उनका मान करो,
‘बेटी’ को बेटी नहीं, घर का अभिमान करो।
जिस घर में बेटी हँसती है, वहाँ ईश्वर बसता है,
उस घर को फिर दुनिया में, कोई गम नहीं डसता है॥