इंदौर (मप्र)।
वामा साहित्य मंच के आभासी पटल पर इंदौर से बाहर के सदस्यों के लिए गोष्ठी आयोजित की गई। यह काव्य गोष्ठी ‘नभ से ओझल होते खग’ विषय पर रही, जिसमें प्रवासी साहित्यकारों और विभिन्न शहरों सहित इंदौर की वामा सखियों ने हिस्सा लिया।
प्रचार प्रमुख सपना साहू ‘स्वप्निल’ ने बताया कि शुभारंभ बकुला पारेख द्वारा सुरीली सरस्वती वंदना से किया गया। अध्यक्षीय उद्बोधन में ज्योति जैन ने सभी का शब्द-सुमन से स्वागत किया। उन्होंने आधुनिकता, पेड़ों की कटाई और मोबाइल टावरों के कारण विलुप्त होते पक्षियों के दर्द को बयां करते हुए पर्यावरण संरक्षण को आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बताया। सचिव स्मृति आदित्य ने स्नेह से भरी ‘मीठा-मीठा बोल चिरैया’ शीर्षक से मार्मिक कविता का वाचन किया। रेखा भाटिया ने कविता के माध्यम से चिड़ियों के सहज संकोच और डर को बखूबी दर्शाया। चंद्रकला जैन ने तमिलनाडु में भारतीय रॉबिन चिड़िया को बचाने के प्रयासों को साझा करते हुए बताया कि हमारी संवेदनशीलता और एक छोटा सा त्याग भी इन मूक जीवों को जीवनदान दे सकता है। माया मालवेंद्र बदेका (नारायणी माया) ने ‘पंखिड़ा कहां छुपी गया हो तम’ गीत सुनाया। ऐसे ही सपना साहू ‘स्वप्निल’ साहू ने बाल कविता ‘मखमली पंखों वाली गौरैया, गाती चीं-चीं, फुदकती ता-ता थैंया’ सुनाई। शैली बख्शी, कल्पना दुबे, सुनीता राठौर, स्वाति ‘सखी’ जोशी एवं आरती चित्तौड़ा आदि ने काव्य और ललित आलेख के माध्यम से विभिन्न पंछियों से हमारे नाते और उनकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
गोष्ठी के तकनीकी पक्ष का संचालन रूपाली पाटनी ने किया। कार्यक्रम का सुंदर संचालन तृप्ति मिश्रा ने किया। आभार प्रभा मेहता ने माना।