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नारी की अस्मिता के लिए जागरूकता आवश्यक

डॉ. प्रभु चौधरी
उज्जैन(मध्यप्रदेश)

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सृष्टि की जन्मदात्री,देव,मनुज,दानव,वानर,सबकी निर्मात्री,पंजभूतों की महाशक्ति की आधारभूत शक्ति की अवहेलना-प्रताड़ना नहीं होनी चाहिए। इसीलिए पूर्वजों ने,ऋषियों ने श्रुतियों और स्मृतियों में नारी पूजा का विधान रख तथा या देवी सर्वभूतेषू प्राण रूपेण संस्थिता कहकर उसकी गरिमा को बढ़ाया। नारी के प्रति सम्मान की परम्परा हमारे इतिहास से चली आ रही है,भारतीय संस्कृति का इतिहास नारी के त्याग,बलिदान,कर्त्तव्यनिष्ठा,कार्य के प्रति समर्पण से भरा है। पन्नाधाय के बलिदान और कर्त्तव्यनिष्ठा की मिसाल शायद दूसरी नहीं तो शौर्य वीरता में रानी लक्ष्मीबाई, झलकारी को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता। नारी इस पृथ्वी की तरह सहिष्णुता की मूरत है,उसने सदैव ही कुछ न कुछ दिया है इस संसार को। उसने विधाता की अदभुत रचना,मानव को जन्म देकर विधाता की संसार की कल्पना को मूर्त रूप दिया है। कभी माता जीजाबाई बनकर इस रचना,मानव को जन्म देकर विधाता की संसार की कल्पना को मूर्त रूप दिया है। कभी माता जीजाबाई बनकर इस देश को शिवाजी जैसा राजा दिया तो कभी शकुन्तला बनकर अपने बेटे को जंगलों,वनों में पालकर भरत जैसा वीर दिया। कभी वह ममता की वात्सल्य की मूरत बनी तो कभी आत्मरक्षण के लिए उसने चण्डी का भी रूप धारण किया। नारी की पवित्रता एवं सतीत्व के तेज के आगे तो बड़ी-बड़ी शक्तियाँ नतमस्तक हुई है। सती शण्डिली ने अपने पवित्र सतीत्व के बल से सूर्य को भी उदित होने से रोक दिया था। सावित्री ने भी यमराज से अपने पति को छुड़ा लिया था और सती अनुसुईया के तेज के आगे भगवान को बालक होकर गोद में खेलने पर मजबूर होना पड़ा था। सीता के समक्ष रावण का राक्षसी बल भी भय खाता था। अपने बल से नारी ने बड़ी शक्तियों को अपने समक्ष झुकाने पर विवश कर दिया था। जब तक नारी इतने सशक्त रूप में थी,तब तक वह देश के लिए नर रत्न पैदा करती रही है और एक के बाद एक महापुरूष देती चली गई। भारतीय संविधान के मूल्यों,स्वतंत्रता,समानता एवं बंधुता पर आधारित सामाजिक न्याय की अवधारणा के कारण और शिक्षा के प्रकाश के जमाने के बदलते हुए तेवरों के साथ-साथ नारी को अमानवीय माने वाली मान्यताएं भी धीरे-धीरे साँसें तोड़ती जा रही है,क्योंकि चौके-चूल्हे से जुड़ी रहने वाली नारी आज जहाँ कम्प्यूटर से खेलने लगी है,विमान चला रही है और युद्ध में सैनिक की भूमिका निभाकर अपनी शक्ति शौर्य को प्रकट कर रही है,वहीं उसने शिक्षा,विज्ञान और राजनीति के साथ-साथ आर्थिक-सामाजिक,साहित्यिक सभी क्षेत्रों में अपनी सफलता के झण्डे गाड़ दिये हैं। नारी को अबला कहना उसकी मानहानि करना है और यह पुरूष का नारी के प्रति घोर अन्याय भी है। यदि बल का अर्थ पशुबल है,तो निःसंदेह नारी पुरूष से कमजोर है क्योंकि उसमें पशुता नहीं है,लेकिन बल का अर्थ नैतिक बल है तो नारी पुरूष से अनन्त गुनी ऊँची है। नारियाँ आधी दुनिया मानी गई है। यदि वह शोषित होती रही तो मनुष्य समाज को सुखी कैसे देख सकता है ? यह भी चिंतनीय है कि,विगत कुछ समय से जिस तरह नारी अत्याचारों में वृद्धि हो रही है, उसे देखकर यह धारणा निराधार साबित होने लगी है कि हम इक्कीसवीं सदी की दहलीज पर खड़े, आगे बढ़ रहे है। नारी पर आए-दिन होने वाले विभिन्न अत्याचारों को देखकर यह कहना भी कठिन नहीं है कि हमारे पुरूष प्रधान समाज में पुरूष मी मानसिकता नारी के प्रति आज भी सोलहवीं शताब्दी की है। पुरूष आज भी अपनी पत्नी,बेटी और बहन को व्यवहार में समानता का दर्जा नहीं दे पाता। यह देखने में आता है कि अधिकांश भारतीय परिवारों में नारी को उसका पति रोटी,कपड़ा और सुरक्षा तो देता है पर बराबरी का दर्जा नहीं देता। वास्तव में नारी-मुक्ति आंदोलन के नाम पर पुरूष के आधिपत्य से या फिर पुरूष प्रधान व्यवस्था से मुक्त होने की बात करना एक तरफा बात होगी। नारी की लड़ाई दोतरफा है,उसे समान अधिकारों के लिये तो लड़ना ही है,वर्ग-विभाजन पर आधारित व्यवस्था के विरूद्ध भी लडना है,साथ ही उस व्यवस्था के विरूद्ध लड़ना है,जिसमें अशिक्षा,बेरोजगारी,भूखमरी, भ्रष्टाचार है और समानता के आधार पर व्यक्ति का,चाहे वह पुरूष हो या नारी शोषण किया जाता है। साथ ही साथ उन्हें इस बात के लिए भी लड़ना है कि वे बुद्धि,क्षमता,कुशलता और कर्मठता,किसी भी दृष्टि से पुरूष से कम नहीं है,फिर क्यों उन्हें पुरूषों से कम समझा जाता है ? उसका भी अपना स्वाभिमान एवं अस्मिता है। समाज में प्रत्येक स्तर पर उसकी बराबरी की साझेदारी है। फिर भी क्यों बार-बार पुरूषों के शोषण एवं अत्याचार की शिकार होती है ? क्यों उसे दहेज के कारण जीवित जलाया जाता है ? क्यों उसे वेदों का पाठ करने से रोका जाता है ? विवाद का कारण कुछ भी हो,अत्याचार की शिकार नारी ही क्यों होती है ? क्या हम विज्ञान और प्रगति के इस युग में भी नारी को मानव नहीं समझते ? विवाह के समय दहेज की मांग देखकर ऐसा लगता है कि जैसे नारी कोई इंसान न होकर मूक पशु है। दहेज की प्रथा ने मातृत्व की गरिमा ही गिरा दी है। रात-दिन भगवान् के मंदिरों में चढ़ावा चढ़ाने वाले और भगवान का गुणगान करने वाले भी जब दहेज में कमी पाते हैं तो देवी कही जाने वाली नारी को भी अग्नि कुण्ड में झोंकने से नहीं चूकते,परन्तु अब परिस्थितियां बदल रही है। नारी अपने अधिकारों एवं कर्त्तव्य के प्रति जागरूक हो गई है। अगर वह संस्कार,मान,मर्यादा में जीना और अपने परिवार की इज्जत के लिए मिटना जानती है तो अपने चरित्र की रक्षा हेतु वह हथियार भी उठाना जानती है। पालने की डोरी थामने वाले नाजुक हाथ समय आने पर अपने अत्याचारी को दण्ड देने से भी नहीं चूकते हैं। जब तक उसे सम्मान,मर्यादा और प्यार के बंधनों में बांधा गया है,तब-तब वह फूल-सी कोमल एवं सहज बनी रही है परन्तु जब भी उसके स्त्रीत्व को ललकारा गया है उसने दुर्गा, चण्डी का रूप धारण कर राक्षसों का संहार किया है। यह कैसा अन्तर्विरोध है कि हमारे सामाजिक परिवेश में जहां परिवार,घर,सुरक्षा तथा सुख की आधारशिला माने-समझे जाते हैं,वहीं अपने ही परिवार के भीतर नारियां आए-दिन प्रताड़ना व मौत का शिकार होती रहती है। क्या इसके पीछे आधुनिक समाज का उपभोक्तावाद, सामाजिक,ऐतिहासिक मान्यताएँ तथा दहेज प्रथा इस तरह की हत्या के लिए जिम्मेदार नहीं है ? समकालीन भारतीय समाज में अर्थ और जाति दोनों शोषण के हथियार हैं और औरतें चाहे द्विजजाति में पैदा हो या शूद्र जाति में,उसकी पैदाईश दोनों जगह शोषण का ही विषय है। जिस समाज में लड़के का जन्म प्रथम श्रेणी की सफलता और लड़की का जन्म दूसरे दर्जे की बात मानी जाती हो,वहां जन्म से ही लड़कियों का अपमान शुरू होना तो स्वाभाविक है। नारी की आर्थिक उपलब्धि कुछ भी नहीं है। लड़कियों के कामकाज का आर्थिक आंकलन करते समय उन्हें अवैतनिक पारिवारिक कार्यकर्ता मान लिया जाता है। फलस्वरूप उनके काम को वास्तविकता की तुलना में कम आंका जाता है। उनके काम को आर्थिक उद्यम का दर्जा नहीं दिया जाता। धर्म,समाज और कानून भले ही नारी की अस्मिता की वकालत करे,लेकिन आज भी नारी की हैसियत पर कटी मैना से ज्यादा अहमियत नहीं रखती। प्रताड़नाओं से जो मृत्यु घर में ही हो जाती है,वे उन्हें मिलने वाली या दी जाने वाली हिंसा की अंतिम अभिव्यक्ति होती है। यह हमारे लिये दुर्भाग्य और अफसोस की बात है कि आज तक हमारा समाज परम्पराओं और रूढ़ियों के प्रति एक स्वस्थ लोकमत नहीं बना पाया। यह हमारी सामाजिक संरचना का ही दोष है,जिसमें जीवन का विशेषतः नारी के जीवन का पक्ष बहुत दुर्बल है। रूस की पहली महिला उपराष्ट्रपति वैलतीना राव चेंको ने कहा है-“पुरूष आसानी से अपनी सत्ता और अधिकार छोड़ने के लिए अधिकार आज उसे मिले हैं,वे समाज ने उसे अनायास ही नहीं दिये। उनके लिये नारी ने लम्बा संघर्ष किया है। इस संघर्ष को हमें यदि आगे बढ़ाना है तो बचपन से ही कन्याओं में चेतना जगानी होगी। नारी को शिक्षित होने के साथ-साथ जागरूक भी होना होगा। पुरातन पंथी मान्यताओं,संस्कारों को तिलांजली देकर स्वनिर्णय की क्षमता अपने-आपमें विकसित करनी होगी। अपने घर-परिवार व अपने जीवन से संबंधित निर्णय स्वयं लेना होंगे,साथ ही उन्हें अमल में भी लाना होगा।”
आवश्यकता इस बात की भी है कि नारी अपने आपको पुरूष से हीन न समझे। प्रकृति प्रदत्त गुणों में नारी को पुरूष से ऊंचा स्थान दिया है,वह तो जननी है,सृष्टि की धुरी है फिर वह हीन या तुच्छ कैसे ? नारी स्वयं को सदैव पुरूष के समकक्ष रखे व पुरूष को साथी समझे। नारी स्वतंत्र तब होगी,जब वह अपनी दुनिया में जागरूक होगी,अपने शोषण का प्रतिकार करेगी और अपनी मानसिकता बदलेगी। प्रसिद्ध कहानीकार इस्मत चुगताई ने लिखा है-“जिंदगी सहनशीलता का इम्तहान ही नहीं,सपनों-उमंगों की ताबीर भी है।”
विकास के लिए बदलाव और ठहराव दोनो जरूरी है,मौलिकता स्थिर रहे और उसके साथ युगीन परिवर्तन भी आते रहे। इस क्रम में विकास का पथ प्रशस्त होता है। भारतीय समाज में वर्षों से दबी-कुचली और सिर झुकाकर हमेशा से ही मौन रहने वाली नारी आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सक्षम हो गयी है। वह अपनी प्राकृतिक मौलिक गुणों को सुरक्षित रखती हुई युगीन संदर्भों को पहचानने लगी है। अणुव्रत और प्रेक्षा ध्यान का जीवन में प्रयोग कर उसने आज अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई है। इसके अंतर्गत श्रीमती इंदिरा गांधी,किरण बेदी,बछेन्द्री पाल इत्यादि को नहीं बिसराया जा सकता। अतः अंत में यही कहना है कि नारी उस जलती हुई मोमबत्ती की तरह है,जो स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देती है,परन्तु समय पड़ने पर यही दावानल का रूप ले सर्वस्व भस्म भी कर डालती है। हे नारी तू फूल भी है,चिंगारी भी।

परिचय-डॉ.प्रभु चौधरी का निवास जिला उज्जैन स्थित महिदपुर रोड पर है। डॉ. चौधरी का जन्म १९६२ में १ अगस्त को उज्जैन में हुआ है। इनकी शिक्षा-हिन्दी और संस्कृत में पी-एच.डी. है। हिन्दी सहित अंग्रेजी संस्कृत,गुजराती तथा बंगला भाषा भी जानने वाले प्रभु जी की ४ प्रकाशित हो चुकी है। आप एक संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं,जो शिक्षकों तथा हिंदी के लिए कार्यरत है। साथ ही राष्ट्रीय कई संस्थाओं में उपाध्यक्ष,सम्पादक सदस्य(नई दिल्ली) और प्रदेश संयोजक हैं। आपको सम्मान के रूप में-साहित्य शिरोमणि,विद्या सागर एवं विद्या वाचस्पति,आदर्श शिक्षक(राज्य स्तरीय),राजभाषा गौरव(दिल्ली),हिन्दी सेवी सम्मान(बैंगलोर),हिन्दी भूषण सम्मान उपाधि,भाषा भूषण सम्मान,तुलसी सम्मान (भोपाल),कादम्बरी सम्मान तथा स्व. हरिकृष्ण त्रिपाठी कादम्बरी सम्मान(जबलपुर) है। प्रकाशन में आपके नाम-राष्ट्रभाषा संचेतना (निबंध संग्रह-२०१७),हिन्दी:जन भाषा से विश्व भाषा की राह पर(२०१७) प्रमुख है। कई अन्तरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों मेंआपकी समन्वयक के रूप में सहभागिता रही है। आपकी लेखन विधा मूलतः आलेख हैl राजभाषा,राष्ट्रभाषा,देवनागरी लिपि तथा सम-सामयिक विषयों एवं महापुरूषों के बारे में लगभग ३००० लेख प्रकाशित हुए हैंl डॉ.चौधरी की लेखनी का उद्देश्य हिंदी भाषा की बढ़ोतरी करना हैl