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न्यायतंत्र की भाषा और हिंदी

लीना मेहेंदले
पूना (महाराष्ट्र)
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एक सशक्त न्यायिक व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि “न्याय केवल किया ही नहीं जाना चाहिए, परंतु न्याय होता हुआ दिखना भी चाहिए।” भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनेक निर्णयों में इसका उल्लेख किया है कि, न्याय ‘पूर्ण’ हुआ यह तभी माना जा सकता है जब न्याय से प्रभावित व्यक्ति को न्याय समझ में आए। दूसरे शब्दों में प्रभावित व्यक्ति को न्याय होता हुआ दिखाई दे। इसके लिए सबसे पहली अपरिहार्य शर्त है कि न्यायिक प्रक्रिया की भाषा सबकी समझ में आने लायक हो। यदि न्यायिक प्रक्रिया की भाषा प्रभावित व्यक्ति की समझ से परे है तो कैसा न्याय ? अतः न्यायिक भाषा आम जनता की भाषा होनी चाहिए।
भारत में हिंदी भाषा को भले ही सब कोई ना समझते हों, परन्तु एक बात पक्की है कि हिंदी जानने वालों की तुलना में अंग्रेजी जानने वाले लोगों की संख्या अत्यल्प है। अतः हिंदी या फिर अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ ही वह महत्वपूर्ण कड़ी हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया को आम जनता से जोड़ सकती है।
हमारे संविधान ने यह प्रावधान तो कर दिया कि संघ की राजभाषा हिंदी है, परन्तु एक अन्य भी प्रावधान किया कि उच्च और उच्चतम न्यायालय की भाषा अंग्रेजी ही रहेगी। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है- हमारी न्यायिक व्यवस्था अंग्रेजों की देन है। अंग्रेजी शासनकाल में न्यायालयों के कामकाज की भाषा अंग्रेजी थी, जो आज भी न्यायालयों में बनी रही है, क्योंकि हमने उस दिशा में परिपूर्ण सार्थक प्रयास नहीं किए। यदि हमारे देश की न्यायिक व्यवस्था भारतसंगत बनानी है, तो प्राथमिक आवश्यकता है कि न्यायालयों के कामकाज की भाषा हिंदी या क्षेत्रीय भाषा हो जिसमें आम जनता अपना मर्म व्यक्त कर सके और न्यायिक प्रक्रिया को समझ सके।
ब्रिटिश राजनीति के कारण अंग्रेजी अभिजात्य वर्ग की भाषा बनी और दुर्भाग्य से आज भी वही स्थिति बनी हुई है। न्यायिक भाषा जब तक अंग्रेजी रहेगी, तब तक न्याय प्रक्रिया भी अभिजात्य वर्ग के लिए ही सुगम रहेगी, परन्तु आम जनता के लिए दुरूह ही रहेगी। आम जनता उसे गरीब की नियति समझकर ही स्वीकार करेगी। इस प्रकार यह पूरी व्यवस्था लोकतंत्र के मूल अधिकारों का हनन करती है। हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ हमारे देश की संस्कृति से निकली हैं और उनका अपना नैतिक महत्व भी है, जो न्यायदान में भी महत्व रखता है। अतः न्यायिक व्यवस्था को भारत के लोकतंत्र से जोड़ना है, तो हिंदी को अपनाना ही होगा। हमारे देश के प्रधानमंत्री ने इसका उल्लेख भी किया है कि न्यायिक तंत्र की भाषा हिंदी होनी चाहिए। यह सही समय है कि इस विषय पर चर्चा की जाए। इस पर विमर्श करने के विशेषज्ञों को आमंत्रित कर एक परिसंवाद की आवश्यकता है।
वैसे तो पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में ३ प्रमुख कार्य हुए हैं-
विधि संबंधित परीक्षा में हिंदी एवं क्षेत्रीय भाषाओं को अनुमति दी गई है।
सर्वोच्च व उच्च न्यायालय से अन्य सभी न्यायालयों में हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में कामकाज को बढ़ावा दिया जा रहा है।
सर्वोच्च, उच्च या अन्य न्यायालयों के अंग्रेजी में घोषित निर्णयों को मशीनी अनुवाद द्वारा हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध करवाया जा रहा है, लेकिन मूल समस्या यह है कि वस्तुतः सारा लेखन पहले अंग्रेजी में और फिर अनुवाद की प्रक्रिया से हिंदी या क्षेत्रीय भाषामें लाया जाता है। इस अनुवाद की भाषा भी अत्यंत दुरूह होती है। अनुवाद का कार्य राजभाषा विभाग के निर्देशों के अनुसार संचालित होता है, जिसमें सर्वप्रमुख है कि टेक्निकल शब्दों का अनुवाद सरकारी शब्दावली के अनुसार हो औऱ अनुवाद शब्दशः हो। चूँकि अँग्रेजी भाषा की वाक्य रचना के नियम भारतीय भाषाओं की वाक्य रचना से भिन्न है और भारतीय शब्दों की छटाएँ संदर्भानुरूप काफी विस्तृत हैं, अतः अंग्रेजी से किया हुआ अनुवाद जनसामान्य के लिए वैसा ही दुरूह बना रहता है, जैसा मूल अंग्रेजी संस्करण। उसमें भाषा लालित्य का अभाव होने से उसे समझना कठिन हो जाता है। कानूनी भाषा को भी लालित्यपूर्ण व सुगम बनाने हेतु गंभीर विषयों पर लेखन करने वाले सिद्धहस्त लेखकों के परामर्श की आवश्यकता होगी, साथ ही उनका वकीली भाषा जानने वालों के साथ जितना अधिक संपर्क होगा, उतना ही वे विषय पर अधिकार वाणी से कुछ कह सकेंगे।
कौशलम् न्यास का प्रस्ताव एवं आग्रह है कि अपने सामाजिक दायित्व के अंतर्गत डीजीएच इस परिसंवाद का आयोजन कर एक सामाजिक पहल करे। इस कार्य में न्यास की ओर से विभिन्न आयाम संभाले जा सकते हैं |

(सौजन्य:वैश्विक हिंदी सम्मेलन, मुंबई)