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पंछी उड़ने लगा

मदन गोपाल शाक्य ‘प्रकाश’
फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश)
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जन्म तेरा हुआ,मात की गोद में,
तू रोता रहा था,मात की गोद में।
पहला निवाला,मिला जो फिया-
खेल करने लगा,मात की गोद में॥

बोध बढ़ने लगा,ध्यान करने लगा,
सार संसार का,निक लगने लगा।
तब देखा जमाना,खुले जब पलक-
जाल संसार में है,तू फँसने लगा॥

हाथ हिलने लगे,पैर डुलने लगे,
बड़ी मन में खुशी,जो अनोखी लगे।
सुख वैभव मिला,नये संसार का-
प्रेम आशा कमल,मन खिलने लगे॥

पंख जम ही गए,पंछी उड़ने लगा,
चाहतों का समंदर,उमड़ने लगा।
प्रेम की बांसुरी जो,बजी इस कदर-
हो गया इस कदर,रुख बदलने लगा॥

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