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पिता तुम याद आते हो

विजयलक्ष्मी विभा 
इलाहाबाद(उत्तरप्रदेश)
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‘पिता का प्रेम, पसीना और हम’ स्पर्धा विशेष…..

तुम्हारे प्यार से सिंचित,
वो आँगन याद आता है
पिता तुम याद आते हो,
तो बचपन याद आता है।

मैं नन्हीं एक बच्ची थी,
तो खुश सारा जमाना था
न चिन्ता थी न पीड़ा थी,
खिलौनों का खजाना था।
रूठ कर जो मैं करती थी,
वो अनशन याद आता है।

वो बरसाती नदी-नाले,
जो द्वारे से निकलते थे
नाव कागज की ले के हम,
चलाने को मचलते थे।
भीग कर डांट खाने का,
वो सावन याद आता है।

मैं रूठूं,माँ मनाती थी,
मैं रोऊँ वो सुलाती थी
मधुर लोरी के जादू से,
वो परियों को बुलाती थी।
उन्हीं की घुंघरुओं का अब,
खनन-खन याद आता है।

वो टेलीफोन माचिस का,
मेरा भैया बनाता था
एक माचिस मुझे देकर,
दूर कितना भगाता था।
वो नकली फोन पर तुतला,
प्राक्कथन याद आता है।

बोझ कांधों पे ले के हम,
चले स्कूल जाते थे
पुस्तकों से मिले जीवन,
खेल सब भूल जाते थे।
सूर की भक्ति रचना का,
वो दर्शन याद आता है।

सयानी मैं हुई तो कुछ,
बदलता-सा नजर आया
माई-बापू के चेहरों पर,
था चिन्ता का कहर आया।
मैं थी आजाद पंछी पर,
वो बंधन याद आता है।

मैं निर्धन हो गई उस दिन,
पराया धन कहा तुमने
मेरे सपनों की दुनिया को,
दिया पल में ढहा तुमने।
मैं जिसका फूल हूँ हरदम,
वो उपवन याद आता है।

बहुत आगे निकल आई हूँ,
मैं बचपन की गलियों से
हो यौवन या हो वृद्धपन,
छली बैठी हूँ छलियों से।
न बचपन न ही वृद्धापन,
न यौवन याद आता है।

नदी किस ओर जाती है,
मैं खुद किस कुल बैठी हूँ
जमाने ने दिया क्या-क्या,
मैं सब-कुछ भूल बैठी हूँ।
माँ आँचल में छिपाती थी,
वही क्षण याद आता था।

जिन्दगी कैसी बेटी की,
पिता तुमने बनाई है
अर्द्ध जीवन तुम्हारी थी,
अर्द्ध जीवन पराई है।
न ये अपना न वो अपना,
समर्पण याद आता है।

कहां देखूं मैं अपने को,
कहां अस्तित्व है मेरा
एक संघर्ष है जीवन,
यही बस स्वत्व है मेरा।
मैं छाया हूँ या काया हूँ,
कि दर्पण याद आता है।

तुम अब तस्वीर बनकर हो,
टंगे दीवार पर मेरी
हँसा करती हैं रेखाएं,
कि जैसे हार पर मेरी।
जो साँसें दें अब जीवन का,
प्रलोभन याद आता है।

न तुम हो अब न मैं हूंगी,
न होंगे ये नजारे भी
नहीं देखेंगे हमको अब,
गगन के चाँद-तारे भी।
पुरानी हो रही दुनिया,
नयापन याद आता है।

अजब-सा दर्द होता है
अजब से ख्याल आते हैं
शून्य पृथ्वी पे डरवाने,
दृश्य विकराल आते हैं।
मुझे हरदम तुम्हारा ही,
संरक्षण याद आता है।

किसी दीवार पर जाकर,
तुम्हारे साथ टंग जाऊं
तो जीवन-मृत्यु दोनों के,
रंगों में मैं भी रंग जाऊं।
कि जाने की जुगत में फिर,
आगमन याद आता है॥

परिचय-विजयलक्ष्मी खरे की जन्म तारीख २५ अगस्त १९४६ है।आपका नाता मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ से है। वर्तमान में निवास इलाहाबाद स्थित चकिया में है। एम.ए.(हिन्दी,अंग्रेजी,पुरातत्व) सहित बी.एड.भी आपने किया है। आप शिक्षा विभाग में प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त हैं। समाज सेवा के निमित्त परिवार एवं बाल कल्याण परियोजना (अजयगढ) में अध्यक्ष पद पर कार्यरत तथा जनपद पंचायत के समाज कल्याण विभाग की सक्रिय सदस्य रही हैं। उपनाम विभा है। लेखन में कविता, गीत, गजल, कहानी, लेख, उपन्यास,परिचर्चाएं एवं सभी प्रकार का सामयिक लेखन करती हैं।आपकी प्रकाशित पुस्तकों में-विजय गीतिका,बूंद-बूंद मन अंखिया पानी-पानी (बहुचर्चित आध्यात्मिक पदों की)और जग में मेरे होने पर(कविता संग्रह)है। ऐसे ही अप्रकाशित में-विहग स्वन,चिंतन,तरंग तथा सीता के मूक प्रश्न सहित करीब १६ हैं। बात सम्मान की करें तो १९९१ में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ.शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘साहित्य श्री’ सम्मान,१९९२ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा सम्मान,साहित्य सुरभि सम्मान,१९८४ में सारस्वत सम्मान सहित २००३ में पश्चिम बंगाल के राज्यपाल की जन्मतिथि पर सम्मान पत्र,२००४ में सारस्वत सम्मान और २०१२ में साहित्य सौरभ मानद उपाधि आदि शामिल हैं। इसी प्रकार पुरस्कार में काव्यकृति ‘जग में मेरे होने पर’ प्रथम पुरस्कार,भारत एक्सीलेंस अवार्ड एवं निबन्ध प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त है। श्रीमती खरे लेखन क्षेत्र में कई संस्थाओं से सम्बद्ध हैं। देश के विभिन्न नगरों-महानगरों में कवि सम्मेलन एवं मुशायरों में भी काव्य पाठ करती हैं। विशेष में बारह वर्ष की अवस्था में रूसी भाई-बहनों के नाम दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए कविता में इक पत्र लिखा था,जो मास्को से प्रकाशित अखबार में रूसी भाषा में अनुवादित कर प्रकाशित की गई थी। इसके प्रति उत्तर में दस हजार रूसी भाई-बहनों के पत्र, चित्र,उपहार और पुस्तकें प्राप्त हुई। विशेष उपलब्धि में आपके खाते में आध्यत्मिक पुस्तक ‘अंखिया पानी-पानी’ पर शोध कार्य होना है। ऐसे ही छात्रा नलिनी शर्मा ने डॉ. पद्मा सिंह के निर्देशन में विजयलक्ष्मी ‘विभा’ की इस पुस्तक के ‘प्रेम और दर्शन’ विषय पर एम.फिल किया है। आपने कुछ किताबों में सम्पादन का सहयोग भी किया है। आपकी रचनाएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर भी रचनाओं का प्रसारण हो चुका है।