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पिता

ममता बनर्जी मंजरी
दुर्गापुर(पश्चिम बंगाल)
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आज नीलकंठ बाबू का अवकाश ग्रहण करने का आखिरी दिन है। सुबह जल्दी-जल्दी नहा धोकर पूजा-पाठ निपटाने के बाद एक-एक कर अपने बीबी और बच्चों की शुभकामनाएं लेते हुए रोज की तरह आफिस की ओर रवाना हुए।
दिसम्बर की कड़कती ठण्ड में एक-एक कदम भारी पड़ रहा था उन्हें,मगर बगैर इसकी कोई परवाह किए वे तेज कदमों से आगे बढ़ने लगे।
रास्ते भर मन ही मन वे अपने बच्चों के प्रति निर्वाह किये गये दायित्वों का हिसाब लगाते जा रहे थे। एक पिता की हैसियत से जिन्दगी में क्या दिया है मैंने अपने बच्चों को…? स्नेह,सुख और वैभव तो हर पिता अपने बच्चों को यथासाध्य देने की कोशिश करते हैं। उनके लिए दूध,मिठाईयां और खिलौने भी लाते हैं। हर समझदार पिता अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर काबिल बनाते हैं। अर्थात,दुनिया का हर पिता अपने बच्चों के लिए जो कुछ करता है,मैंने भी किया मगर दूर्भाग्यवश मेरे बेटे को नौकरी नहीं मिली अब तक। आगे भी नौकरी मिलने की कोई संभावना नहीं नजर आ रही है।
अवकाश ग्रहण करने के बाद मिलने वाले सारे पैसे भी एक छोटा-सा मकान बनवाने और सुनिता की शादी करने में ही खर्च हो जाएंगे। जो थोड़े -बहुत बचेंगे भी तो बुढ़ापे की दवा-दारु के लिए,पर मेरा बेटा अनिल क्या करेगा ? बेचारा न जाने कब से दर-दर भटक रहा है नौकरी के लिए।आजकल कितना उदास रहता है बेचारा।
अचानक अनिल की कही सालभर पहले की बात उनके कानों में गूंजने लगी,-“पिताजी,जब आप अपनी नौकरी से अवकाश ग्रहण करोगे,तब मैं आपकी सारी जिम्मेवारी अपने कंधों पर लेकर आपको आराम दूंगा।”
लेकिन….अब अनिल का उदास चेहरा उनकी आँखों के सामने नजर आने लगाl
“नहीं बेटा,तुम उदास मत होना। तुम्हारी उदासी मुझसे देखी नहीं जाती।
बेटा,यह बात सही है कि आज मेरे आफिस का आखिरी दिन है,पर अब भी मैं एक सरकारी सेवक हूँ। अवकाश प्राप्त करने में लगभग सात-आठ घंटे बाकी हैं मेरे पास। मैं तुझे नौकरी दिलवाऊंगा बेटा।”
क क् क च् च्च…..
तेज गति से आ रहे एक ट्रक से नीलकंठ बाबू का शरीर टकराया। अगले ही पल हो-हल्ला के बाद खून से लथपथ नीलकंठ बाबू का मृत शरीर ट्रक के चक्के की नीचे से घसीट कर बाहर निकाला गया। देखते-ही-देखते वहां लोगों की भीड़ जम गई।
“एक्सिडेंट का मामला है। अनुकम्पा के आधार पर नीलकंठ बाबू के बेटे की नौकरी होना तय है,”-भीड़ में से एक आवाज उभर कर आई।

परिचय-ममता बनर्जी का साहित्यिक उपनाम `मंजरी` हैl आपकी जन्मतिथि २१ मार्च १९७० एवं जन्म स्थान-इचाक,हज़ारीबाग (झारखण्ड) हैl वर्तमान पता-गिरिडीह (झारखण्ड)और स्थाई निवास दुर्गापुर(पश्चिम बंगाल) हैl राज्य झारखण्ड से नाता रखने वाली ममता जी ने स्नातक तक शिक्षा प्राप्त की हैl आप सामाजिक गतिविधि में कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़कर नियमित साहित्य सृजन में सक्रिय हैं। लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल,लेख सहित साहित्य के लगभग सभी विधाओं में लेखन हैl झारखण्ड के झरोखे से(२०११) किताब आ चुकी है तो रचनाओं का प्रकाशन अखबारों सहित अन्य साहित्यिक पत्रिकाओं में भी हो चुका हैl आपको साहित्य शिरोमणि, किशोरी देवी सम्मान,अपराजिता सम्मान सहित पूर्वोत्तर विशेष सम्मान और पार्श्व साहित्य सम्मान आदि मिल चुके हैंl विशेष उपलब्धि में झारखण्ड प्रदेश में एक साहित्य संस्था का अध्यक्ष होना और अन्य में भी पदाधिकारी होना हैl इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिंदी को आगे बढ़ाना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-झारखण्ड का परिवेश हैl आपकी विशेषज्ञता-छंदबद्ध कविता लेखन में हैl