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प्रकृति एक अनसुलझी पहेली

ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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प्रकृति एक अनसुलझी पहेली है,
यह एक सुलझी हुई सहेली भी है
प्रकृति में उगते है सूरज तारे-चंदा,
जिससे बनते दिन और रात का धंधा।

प्रकृति में मिट्टी है जिसमें बोते हैं बीज,
वही बीज बड़ा होकर बन जाता है पौधा
प्रकृति का अपना भाई एक हिसाब होता है,
भूल से भी इसमें नहीं है कोई सौदा।

इस प्रकृति का तो है जी सारा खेल निराला,
कहीं पीने का पानी नहीं, कहीं जल विशाला
कहीं पर ऊँचे पर्वत तो कहीं पर रेत का टीला,
कहीं का मौसम है गर्म तो कहीं पर है बर्फीला।

प्रकृति से न करें छेड़छाड़, वरना वह करेगी हिसाब 
अपना नहीं तो भावी पीढ़ी का कुछ तो रखें ख्याल
हरित गृह और ग्लोबल वार्मिंग का कहर है बरपाया,
काटें पेड़ दस तो लगाएं साहब पेड़ हज़ारों गुणा।

प्रकृति में हर छोटे-बड़े जीव का भी मतलब होता है,
जीवों का एक-दूसरे से संबंध और संतुलन होता है
चूहे नष्ट करते फसल को, वह साँप का भोजन होता है,
सभी खतरनाक नहीं, केंचुआ किसान का मित्र होता है।

फंगस, अलगी बैक्टिरिया और वायरस का भी धमाल है,
कुछ मानव के लिए दुश्मन, तो कुछ दोस्त बेमिसाल है
हाथी, घोड़े, बाघ, लंगूर, बंदर, मगरमच्छ और घड़ियाल है,
सभी का प्रकृति में अपना महत्व है सबके सब कमाल है।

प्रकृति की पहेली मनुष्य तो सुलझा नहीं पाता है,
जितनी सुलझाए, वह उतना ही उलझता जाता है।
चंद्रमा पर घर बना रहा है आदमी और वहीं पानी,
आक्सीजन के लिए अंतरिक्ष में उलझ जाता है॥
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