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प्रकृति बिलबिला रही

राधा गोयल
नई दिल्ली
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पढ़ा-लिखा मानव है, लेकिन है कितना नादान
भीड़ लगी है वहाँ, जहाँ है ए.सी की दुकान।
वहीं पास में एक मनुज पौधे लेकर बैठा है,
पढ़ा-लिखा मानव तो अहंकार में ही डूबा ऐंठा है
नहीं जानता पौधों से ही वृक्ष बनेंगे,
वृक्ष बड़े होंगे तो वे ऑक्सीजन देंगे
कार्बन को सोखेंगे और छाया भी देंगे,
अपनी कोटर में पंछियों को आश्रय देंगे।

पढ़ा-लिखा मानव क्या जाने इन बातों को ?
प्रकृति की चेतावनी को और आघातों को
पौध लगाकर उन्हें सींचना भी पड़ता है,
काया से थोड़ा-सा श्रम करना पड़ता है
जो माटी से जुड़े और खेले माटी में,
बिन पैसों के खेल-खेलकर
बड़े हुए जो इस माटी में
पढ़े-लिखे ये लोग अशिक्षित जिनको कहते,
वही लोग वृक्षों के महत्व को खूब समझते।

जो ए.सी. के लिए कतार में लगे हैं यहाँ,
नहीं जानते ए.सी. का नुकसान है कितना
इसकी डक्ट से जो गर्मी बाहर है निकलती,
उसकी तप्त दाह कितनी संक्रामक होती
पढ़ा-लिखा मानव जाने क्यों नहीं समझता,
अपने सुख की चिंता में ही व्यस्त वो रहता।
नहीं जानता धरती अब बेहाल हुई है,
देख क्रूरता मानव की बिलबिला रही है॥