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प्रभु अवतार

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

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जब-जब धर्म धरा पर रोता, बढ़ता तम का भार है,
तब-तब लेकर दिव्य रूप में, आते  प्रभु अवतार है
सत्य, दया, करुणा के पथ का करते नूतन विस्तार, 
मानवता को राह दिखाते, बनकर दृढ़ आधार है। 

मत्स्य, कूर्म, वराह रूप से रक्षा  की संसार है,
नृसिंह बने भक्त-हितकारी, मिटा    दिया संहार है
वामन बन अभिमान हर लिया, खोला चहुँ ज्ञान-द्वार, 
धर्म-सुरक्षा हेतु सदा ही जगे    दिव्य अवतार है। 

परशुराम के तेज दिखता अन्यायों पर प्रहार है,
मर्यादित राम बने तो जग में आदर्श अपार है
कृष्ण बने जीवन-संगीत, जगत  गीता का उपहार, 
कर्मयोग का मंत्र सुनाकर किया ज्ञ जगत उद्धार है। 

बुद्ध रूप में प्रेम  सिखाया, त्याग, शांति, सद्भाव है। 
दीन-दुखी के अश्रु पोंछकर जग  में भरा प्रभाव है
मानवता के हित में अर्पित हो हर पल अपना भाव, 
अवतारों की पुण्य कथा से मिलता नव उत्साह है। 

अवतारों का मूल संदेश, सत्य-सुपथ अपनाइए,
लोभ, मोह, अहंकार त्याग, निज जीवन सफल बनाइए। 
सेवा, प्रेम, परोपकार का    दीवाली सदा जलाइए, 
ईश्वर का अंश स्वयं बनकर जगत में सुयशक्ष बढ़ाइए॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥