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बचपन

हरीश बिष्ट
अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड)
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बचपन तो बचपन ही था,
बचपन को जाना था कब।
जब रखा कदम जवानी में,
बचपन को समझा है अब॥
बचपन को समझा है अब,
बचपन तो बचपन ही…॥

थे खाते-पीते मौज मनाते,
हम कितने रहते थे मस्त।
खेलते रहते नहीं रुकते थे,
हो जाते थे चाहे पस्त॥
हो जाते थे चाहे पस्त,
बचपन तो बचपन ही…॥

प्यार सभी से मिलता था,
थे सबके राजदुलारे हम।
दादा-दादी,नाना-नानी,
सबकी आँखों के तारे हम॥
सबकी आँखों के तारे हम,
बचपन तो बचपन ही…॥

ना थी कोई जिम्मेदारी,
ना हमको कोई थी टेंशन।
जब पड़ती थी डाँट हमें,
जाते थे हम भोले बन॥
जाते थे हम भोले बन,
बचपन तो बचपन ही…॥

खेल-खिलौना और मिठाई,
खाते संग में खूब पिटाई।
खेलते-खेलते आपस में ही,
होती थी तब खूब लड़ाई॥
होती थी तब खूब लड़ाई,
बचपन तो बचपन ही…॥

दिन आते याद वो बचपन के,
जब देखूँ करतब बच्चों के।
मन जो जीना चाहे बचपन को,
जी लें बच्चों संग बच्चा बन के॥
जी लें बच्चों संग बच्चा बन के,
बचपन तो बचपन ही था…
बचपन को जाना था कब।
जब रखा कदम जवानी में,
बचपन को समझा है अब॥

परिचय- हरीश बिष्ट की जन्मतारीख ३० जुलाई १९८० है। वर्तमान में मोतीबाग(नई दिल्ली) में रहते हैं, जबकि स्थाई निवास ग्राम-मटेला (रानीखेत),जिला-अल्मोड़ा (उत्तराखण्ड)है। एम.ए.(अर्थशास्त्र) तक शिक्षित श्री बिष्ट का कार्यक्षेत्र-नौकरी है। लेखन विधा-कविता एवं गीत है। सांझा काव्य संग्रह में आपकी रचनाएं आ चुकी हैं तो पत्रिकाओं में भी रचनाएं प्रकाशित हुई है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में सांझा काव्य संग्रहों सहित रामेश्वर दयाल दुबे साहित्य सम्मान,आखिल भारतीय साहित्य परिषद से सर्वश्रेष्ठ सहभागिता के लिए सम्मान पत्र, ‘भारत विभूति’,’काव्य अरुणोदय’ आदि हैं। आपकी विशेष उपलब्धि-साझा काव्य संग्रह-अर्पण, अभिव्यक्ति,नवचेतना,अरुणोदय और भावकलश है। पसंदीदा लेखक-जयशंकर प्रसाद को मानने वाले श्री बिष्ट के लिए प्रेरणा पुंज-आनन्द वर्धन शर्मा हैं। विशेषज्ञता-साहित्यिक रचनाओं का सृजन ही विशेषता है एवं उसी ओर प्रयासरत हैं। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार-“अपने-आपको सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मैंने इस पावन धरती पर जन्म लिया, जिसके लिए सदैव इस मातृभूमि का ऋणी रहूँगा। हिन्दी भाषा,हमारी मातृ-भाषा है,और मुझे गर्व है अपनी इस मातृ-भाषा पर। हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार के तहत नवसृजन करते हुए आपना योगदान देने के लिए सदैव प्रयासरत हूँ।