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बमों की बौछार-बातों की बाज़ीगरी से वैश्विक व्यवस्था पर प्रहार

डॉ. शैलेश शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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२८ फरवरी २०२६ की रात जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर संयुक्त हवाई हमले शुरू किए, तो यह पूरी वैश्विक व्यवस्था के लिए भूकंप था। हमले ईरानी सैन्य और सरकारी ठिकानों को निशाना बनाकर किए गए, जिनमें सर्वोच्च नेता अली खामनेई और अन्य ईरानी अधिकारी मारे गए, और बड़ी संख्या में नागरिक भी हताहत हुए। सबसे चौंकाने वाली बात यह थी, कि ये हमले ओमान में चल रही अमेरिका-ईरान अप्रत्यक्ष वार्ता के दौरान किए गए — वार्ता की आड़ में सैन्य कार्रवाई करना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की विश्वसनीयता पर गहरा प्रहार है। ईरान ने इजराइल, अमेरिकी ठिकानों और मध्य पूर्व में अमेरिकी सहयोगियों पर मिसाइल और ड्रोन हमलों से जवाब दिया, और होर्मुज जलडमरूमध्य (जिससे दुनिया के कुल तेल व्यापार का लगभग पाँचवाँ हिस्सा गुजरता है) को बंद कर दिया। वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार दोनों बुरी तरह बाधित हुए। अमेरिका ने इसके बाद जलडमरूमध्य की नाकेबंदी की, जिससे जहाजों का आवागमन लगभग ठप हो गया।
  इस युद्ध की जड़ें २०२३ में हमास के ७ अक्टूबर के हमले और गाज़ा युद्ध में हैं। इजराइल ने हमास, हिजबुल्लाह, हूती और अन्य ईरान-समर्थित मिलिशियाओं को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया। दमिश्क में ईरानी वाणिज्य दूतावास पर हमला और इस्माइल हनीया की हत्या को ईरान ने अप्रैल और अक्टूबर २०२३४ में सीमित प्रतिकारी हमलों से जवाब दिया। जून २०२५ में बारह दिवसीय युद्ध में अमेरिकी हवाई हमले से ईरान के परमाणु ठिकाने निशाना बनाए गए। ईरान ने २००३ में अली खामनेई के फतवे के अनुसार परमाणु हथियार विकास निलंबित रखा था — विश्लेषकों ने ईरान की रणनीति को परमाणु हेजिंग बताया। जनवरी २०२६ में १९७९ के बाद के सबसे बड़े विरोध प्रदर्शनों में ईरानी सुरक्षा बलों ने हजारों नागरिकों का नरसंहार किया, जिसने ट्रम्प को सैन्य कार्रवाई की धमकी और २००३ के इराक आक्रमण के बाद सबसे बड़ी सैन्य तैनाती का आधार दिया। ट्रम्प और उनके प्रशासन के अधिकारियों ने ईरान पर परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम बढ़ाने का आरोप लगाया, जबकि ईरान ने अमेरिका पर दुष्प्रचार अभियान चलाने का।
    युद्ध को लेकर शांति प्रयास अभी तक विफल रहे हैं, लेकिन पूरी तरह ठप नहीं हैं। इस्लामाबाद में उपराष्ट्रपति वांस और ईरानी विदेश मंत्री अराघची के बीच पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की मध्यस्थता में मैराथन वार्ता हुई, लेकिन समझौता नहीं हो सका। ट्रम्प ने वांस, विटकॉफ और कुशनर को कूटनीतिक रास्ता खोजने का काम सौंपा है। सैटेलाइट छवियाँ दिखाती हैं कि ईरान मिसाइल ठिकानों की बहाली कर रहा है, सुरंगों का मलबा हटाने के लिए डंप ट्रक और लोडर लगे हैं। जेम्स मार्टिन सेंटर के शोधकर्ताओं के अनुसार यह अपेक्षित है, क्योंकि इन ठिकानों की डिजाइन ही यही है — पहला हमला सहो, बाहर निकलो, फिर प्रतिहमला करो।    
  दिलचस्प बात यह है कि एसएंडपी ५०० और नैस्डैक ने युद्धविराम की आशा में ईरान युद्ध से जुड़े सभी नुकसानों की भरपाई कर ली — बाजार का मानना है कि सौदा होगा।
   इराक में संवैधानिक समय-सीमा चूकने, नई सरकार गठन की गतिरोध और क्षेत्रीय अस्थिरता ने स्थिति और जटिल बनाई है। चीन भी इस स्थिति का लाभ उठा रहा है — अमेरिका के ईरान में व्यस्त रहने के बीच बीजिंग क्षेत्रीय वातावरण को अपने पक्ष में ढालने का प्रयास कर रहा है। खाद्य सुरक्षा पर भी प्रभाव गंभीर है — होर्मुज से तेल के अलावा उर्वरक और रसायनों का भी व्यापार होता है, और दीर्घकालिक बाधा से विकासशील देशों में खाद्य कीमतों में भारी वृद्धि हो सकती है।
भारत के लिए यह संकट बहुआयामी है — ८८.२ प्रतिशत कच्चे तेल आयात निर्भरता, होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता, मध्य पूर्व में बसे लगभग ९० लाख भारतीय प्रवासी, और एलपीजी की बढ़ती कीमतें। भारत ने रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए सावधानी से काम लिया है — न स्पष्ट रूप से अमेरिकी पक्ष लिया और न ईरान के साथ ऐतिहासिक संबंधों को त्यागा। कृषि क्षेत्र जो ४६ प्रतिशत कार्यबल को रोजगार देता है, उर्वरक आपूर्ति बाधा से सीधे प्रभावित होगा — भारत की उर्वरक सब्सिडी पहले ही बजट का बड़ा हिस्सा है। डिप्लोमैट पत्रिका ने कहा है कि ईरान युद्ध में तेल केवल वस्तु नहीं — यह मापदंड है कि अमेरिका भारत की स्वतंत्र पसंदों को कहाँ तक स्वीकार करता है। जब वार्ता के दौरान बम गिराए जाएँ, त्योहार मनाते परिवारों पर मिसाइलें दागी जाएँ, चिकित्सा संस्थानों को निशाना बनाया जाए, और सबसे शक्तिशाली देश अंतरराष्ट्रीय नियमों को कुचलें — तो विश्व को स्वीकार करना होगा कि यह संकट केवल मध्य पूर्व का नहीं, सम्पूर्ण मानवता का है।
   द्वितीय विश्व युद्ध के बाद निर्मित नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था अपने सबसे गंभीर संकट से गुजर रही है, और इस व्यवस्था को बचाने की जिम्मेदारी केवल बड़ी शक्तियों की नहीं, हर उस देश की है जो शांति, न्याय और मानवीय गरिमा में विश्वास रखता है।